ghazalKuch Alfaaz

ग़म से बहल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं दर्द में ढल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं साया-ए-वस्ल कब से है आप का मुंतज़िर मगर हिज्र में जल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं अपने ख़िलाफ़ फ़ैसला ख़ुद ही लिखा है आपने हाथ भी मल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं वक़्त ने आरज़ू की लौ देर हुई बुझा भी दी अब भी पिघल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं दायरा-वार ही तो हैं इश्क़ के रास्ते तमाम राह बदल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं अपनी तलाश का सफ़र ख़त्म भी कीजिए कभी ख़्वाब में चल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं

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बग़ैर उस को बताए निभाना पड़ता है ये इश्क़ राज़ है इस को छुपाना पड़ता है मैं अपने ज़ेहन की ज़िदस बहुत परेशाँ हूँ तेरे ख़याल की चौखट पे आना पड़ता है तेरे बग़ैर ही अच्छे थे क्या मुसीबत है ये कैसा प्यार है हर दिन जताना पड़ता है

Mehshar Afridi

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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

Ahmad Faraz

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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अश्क ज़ाया' हो रहे थे, देख कर रोता न था जिस जगह बनता था रोना, मैं वहाँ रोता न था सिर्फ़ तेरी चुप ने मेरे गाल गीले कर दिए मैं तो वो हूँ, जो किसी की मौत पर रोता न था मुझ पर कितने एहसान है गुज़रे, पर उन आँखों को क्या मेरा दुख ये है, के मेरा हम सेफ़र रोता न था मैं ने उस के वस्ल में भी हिज्र कटा है कहीं, वो मेरे कंधे पे रख लेता था सर, रोता न था प्यार तो पहले भी उस सेे था, मगर इतना नहीं तब में उस को छू तो लेता था, मगर रोता न था गिरियो ज़ारी को भी एक ख़ास मौसम चाहिए, मेरी आँखें देख लो, मैं वक़्त पर रोता न था

Tehzeeb Hafi

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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मैं कब से अपनी तलाश में हूँ मिला नहीं हूँ सवाल ये है कि मैं कहीं हूँ भी या नहीं हूँ ये मेरे होने से और न होने से मुन्कशिफ़ है कि रज़्म-ए-हस्ती में क्या हूँ मैं और क्या नहीं हूँ मैं शब निज़ादों में सुब्ह-ए-फ़र्दा की आरज़ू हूँ मैं अपने इम्काँ में रौशनी हूँ सबा नहीं हूँ गुलाब की तरह इश्क़ मेरा महक रहा है मगर अभी उस की किश्त-ए-दिल में खिला नहीं हूँ न जाने कितने ख़ुदाओं के दरमियाँ हूँ लेकिन अभी मैं अपने ही हाल में हूँ ख़ुदा नहीं हूँ कभी तो इक़बाल-मंद होगी मिरी मोहब्बत नहीं है इम्काँ कोई मगर मानता नहीं हूँ हवाओं की दस्तरस में कब हूँ जो बुझ रहूँगा मैं इस्तिआरा हूँ रौशनी का दिया नहीं हूँ मैं अपनी ही आरज़ू की चश्म-ए-मलाल में हूँ खुला है दर ख़्वाब का मगर देखता नहीं हूँ उधर तसलसुल से शब की यलग़ार है इधर मैं बुझा नहीं हूँ बुझा नहीं हूँ बुझा नहीं हूँ बहुत ज़रूरी है अहद-ए-नौ को जवाब देना सो तीखे लहजे में बोलता हूँ ख़फ़ा नहीं हूँ

Pirzada Qasim

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