ghazalKuch Alfaaz

ग़ज़ल तुम को सुनाने के बहाने ढूँड लेता हूँ मैं यूँँ ही मुस्कुराने के बहाने ढूँड लेता हूँ मैं काफ़िर हूँ ख़ुदा के दर कभी सज्दा नहीं करता मगर मैं सर झुकाने के बहाने ढूँड लेता हूँ कोई भी खेल हो मैं एहतियात इतनी बरतता हूँ मैं पहले हार जाने के बहाने ढूँढ़ लेता हूँ नहीं दिखता है मुझ को ठीक से अब दूर का कह कर तिरे नज़दीक आने के बहाने ढूँड लेता हूँ मैं उस के दर पे जा कर माँगता हूँ हाथ जब तेरा ख़ुदा को आज़माने के बहाने ढूँड लेता हूँ तिरी महफ़िल में आता हूँ पहन कर धूप का चश्मा नज़र तुझ पर टिकाने के बहाने ढूँड लेता हूँ मैं ला-जवाब हूँ लेकिन है अक़ीदा ईद पर मेरा गले तुझ को लगाने के बहाने ढूँड लेता हूँ है मक़्सद ये कि लोगों के कलेजों को मिले ठंडक मैं अपना दिल जलाने के बहाने ढूँड लेता हूँ बहुत ज़ोरों से हँस पड़ता हूँ मैं बिन बात के अक्सर मैं यूँँ आँसू बहाने के बहाने ढूँड लेता हूँ

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

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क्या ग़लतफ़हमी में रह जाने का सदमा कुछ नहीं वो मुझे समझा तो सकता था कि ऐसा कुछ नहीं इश्क़ से बच कर भी बंदा कुछ नहीं होता मगर ये भी सच है इश्क़ में बंदे का बचता कुछ नहीं जाने कैसे राज़ सीने में लिए बैठा है वो ज़ह्र खा लेता है पर मुँह से उगलता कुछ नहीं शुक्र है कि उस ने मुझ सेे कह दिया कि कुछ तो है मैं उस सेे कहने ही वाला था कि अच्छा कुछ नहीं

Tehzeeb Hafi

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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