है मश्क़-ए-सुख़न जारी चक्की की मशक़्क़त भी इक तुर्फ़ा तमाशा है 'हसरत' की तबीअत भी जो चाहो सज़ा दे लो तुम और भी खुल खेलो पर हम से क़सम ले लो की हो जो शिकायत भी दुश्वार है रिंदों पर इंकार-ए-करम यकसर ऐ साक़ी-ए-जाँ-परवर कुछ लुत्फ़-ओ-इनायत भी दिल बस-कि है दीवाना उस हुस्न-ए-गुलाबी का रंगीं है उसी रू से शायद ग़म-ए-फ़ुर्क़त भी ख़ुद इश्क़ की गुस्ताख़ी सब तुझ को सिखा देगी ऐ हुस्न-ए-हया-परवर शोख़ी भी शरारत भी बरसात के आते ही तौबा न रही बाक़ी बादल जो नज़र आए बदली मेरी निय्यत भी उश्शाक़ के दिल नाज़ुक उस शोख़ की ख़ू नाज़ुक नाज़ुक इसी निस्बत से है कार-ए-मोहब्बत भी रखते हैं मिरे दिल पर क्यूँँ तोहमत-ए-बेताबी याँ नाला-ए-मुज़्तर की जब मुझ में हो क़ुव्वत भी ऐ शौक़ की बेबाकी वो क्या तेरी ख़्वाहिश थी जिस पर उन्हें ग़ुस्सा है इनकार भी हैरत भी हर-चंद है दिल शैदा हुर्रियत-ए-कामिल का मंज़ूर-ए-दुआ लेकिन है क़ैद-ए-मोहब्बत भी हैं 'शाद' ओ 'सफ़ी' शाइ'र या 'शौक़' ओ 'वफ़ा' 'हसरत' फिर 'ज़ामिन' ओ 'महशर' हैं 'इक़बाल' भी 'वहशत' भी
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दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे वर्ना कहीं तक़दीर तमाशा न बना दे ऐ देखने वालो मुझे हँस हँस के न देखो तुम को भी मोहब्बत कहीं मुझ सा न बना दे मैं ढूँढ़ रहा हूँ मिरी वो शम्अ' कहाँ है जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे आख़िर कोई सूरत भी तो हो ख़ाना-ए-दिल की का'बा नहीं बनता है तो बुत-ख़ाना बना दे 'बहज़ाद' हर इक गाम पे इक सज्दा-ए-मस्ती हर ज़र्रे को संग-ए-दर-ए-जानाना बना दे
Behzad Lakhnavi
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क्या ज़रूरी है मुहब्बत में तमाशा होना जिस सेे मिलना ही नहीं उस सेे जुदा क्या होना ज़िंदा होना तो नहीं हिज्र में ज़िंदा होना हम इसे कहते हैं होने के अलावा होना तेरा सूरज के क़बीले से तअल्लुक़ तो नहीं ये कहाँ से तुझे आया है सभी का होना तू ने आने में बहुत देर लगा दी वरना मैं नहीं चाहता था हिज्र में बूढ़ा होना क्या तमाशा है कि सब मुझ को बुरा कहते हैं और सब चाहते हैं मेरी तरह का होना
Abbas Tabish
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अ'र्ज़-ए-अलम ब-तर्ज़-ए-तमाशा भी चाहिए दुनिया को हाल ही नहीं हुलिया भी चाहिए ऐ दिल किसी भी तरह मुझे दस्तियाब कर जितना भी चाहिए उसे जैसा भी चाहिए दुख ऐसा चाहिए कि मुसलसल रहे मुझे और उस के साथ साथ अनोखा भी चाहिए इक ज़ख़्म मुझ को चाहिए मेरे मिज़ाज का या'नी हरा भी चाहिए गहरा भी चाहिए इक ऐसा वस्फ़ चाहिए जो सिर्फ़ मुझ में हो और उस में फिर मुझे यद-ए-तूला भी चाहिए रब्ब-ए-सुख़न मुझे तिरी यकताई की क़सम अब कोई सुन के बोलने वाला भी चाहिए क्या है जो हो गया हूँ मैं थोड़ा बहुत ख़राब थोड़ा बहुत ख़राब तो होना भी चाहिए हँसने को सिर्फ़ होंट ही काफ़ी नहीं रहे 'जव्वाद-शैख़' अब तो कलेजा भी चाहिए
Jawwad Sheikh
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क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता तू छोड़ रहा है तो ख़ता इस में तिरी क्या हर शख़्स मिरा साथ निभा भी नहीं सकता प्यासे रहे जाते हैं ज़माने के सवालात किस के लिए ज़िंदा हूँ बता भी नहीं सकता घर ढूँड रहे हैं मिरा रातों के पुजारी मैं हूँ कि चराग़ों को बुझा भी नहीं सकता वैसे तो इक आँसू ही बहा कर मुझे ले जाए ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता
Waseem Barelvi
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इक दिन ज़बाँ सुकूत की पूरी बनाऊँगा मैं गुफ़्तुगू को ग़ैर-ज़रूरी बनाऊँगा तस्वीर में बनाऊँगा दोनों के हाथ और दोनों में एक हाथ की दूरी बनाऊँगा मुद्दत समेत जुमला ज़वाबित हों तय-शुदा या'नी तअल्लुक़ात उबूरी बनाऊँगा तुझ को ख़बर न होगी कि मैं आस-पास हूँ इस बार हाज़िरी को हुज़ूरी बनाऊँगा रंगों पे इख़्तियार अगर मिल सका कभी तेरी सियाह पुतलियाँ भूरी बनाऊँगा जारी है अपनी ज़ात पे तहक़ीक़ आज-कल मैं भी ख़ला पे एक थ्योरी बनाऊँगा मैं चाह कर वो शक्ल मुकम्मल न कर सका उस को भी लग रहा था अधूरी बनाऊँगा
Umair Najmi
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हर हाल में रहा जो तिरा आसरा मुझे मायूस कर सका न हुजूम-ए-बला मुझे हर नग़्में ने उन्हीं की तलब का दिया पयाम हर साज़ ने उन्हीं की सुनाई सदा मुझे हर बात में उन्हीं की ख़ुशी का रहा ख़याल हर काम से ग़रज़ है उन्हीं की रज़ा मुझे रहता हूँ ग़र्क़ उन के तसव्वुर में रोज़ ओ शब मस्ती का पड़ गया है कुछ ऐसा मज़ा मुझे रखिए न मुझ पे तर्क-ए-मोहब्बत की तोहमतें जिस का ख़याल तक भी नहीं है रवा मुझे क्या कहते हो कि और लगा लो किसी से दिल तुम सा नज़र भी आए कोई दूसरा मुझे बेगाना-ए-अदब किए देती है क्या करूँं उस महव-ए-नाज़ की निगह-ए-आशना मुझे उस बे-निशां के मिलने की 'हसरत' हुई उम्मीद आब-ए-बक़ा से बढ़ के है ज़हर-ए-फ़ना मुझे
Hasrat Mohani
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आसान-ए-हक़ीकी है न कुछ सहल-ए-मजाज़ी मालूम हुई राह-ए-मोहब्बत की दराज़ी कुछ लुत्फ़ ओ नज़र लाज़िम ओ मलज़ूम नहीं हैं इक ये भी तमन्ना की न हो शोबदा बाज़ी दिल ख़ूब समझता है तिरे हर्फ़-ए-करम को हर-चंद वो उर्दू है न तुर्की है न ताज़ी क़ाएम है न वो हुस्न-ए-रुख़-ए-यार का आलम बाक़ी है न वो शौक़ की हंगामा-नवाज़ी ऐ इश्क़ तिरी फ़तह बहर-हाल है साबित मर कर भी शहीदान-ए-मोहब्बत हुए ग़ाज़ी कर जल्द हमें ख़त्म कहीं ऐ ग़म-ए-जानाँ काम आएगी किस रोज़ तिरी सीना-गुदाज़ी मालूम है दुनिया को ये 'हसरत' की हक़ीक़त ख़ल्वत में वो मय-ख़्वार है जल्वत में नमाज़ी
Hasrat Mohani
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क्या वो अब नादिम हैं अपने जौर की रूदाद से लाए हैं मेरठ जो आख़िर मुझ को फ़ैज़ाबाद से सैर-ए-गुल को आई थी जिस दम सवारी आप की फूल उट्ठा था चमन फ़ख़्र-ए-मुबारकबाद से हर कस-ओ-ना-कस हो क्यूँँकर कामगार-ए-बे-ख़ुदी ये हुनर सीखा है दिल ने इक बड़े उस्ताद से इक जहाँ मस्त-ए-मोहब्बत है कि हर सू ब-ए-उन्स छाई है उन गेसुओं की निकहत-ए-बर्बाद से अब तलक मौजूद है कुछ कुछ लगा लाए थे हम वो जो इक लपका कभी न ख़ाक-ए-जहाँ आबाद से दावा-ए-तक़्वा का 'हसरत' किस को आता है यक़ीं आप और जाते रहें पीर-ए-मुग़ाँ की याद से
Hasrat Mohani
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अपना सा शौक़ औरों में लाएँ कहाँ से हम घबरा गए हैं बे-दिली-ए-हमरहाँ से हम कुछ ऐसी दूर भी तो नहीं मंज़िल-ए-मुराद लेकिन ये जब कि छूट चलें कारवाँ से हम ऐ याद-ए-यार देख कि बा-वस्फ़-ए-रंज-ए-हिज्र मसरूर हैं तिरी ख़लिश-ए-ना-तवाँ से हम मालूम सब है पूछते हो फिर भी मुद्दआ' अब तुम से दिल की बात कहें क्या ज़बाँ से हम ऐ ज़ोहद-ए-ख़ुश्क तेरी हिदायत के वास्ते सौग़ात-ए-इश्क़ लाए हैं कू-ए-बुताँ से हम बेताबियों से छुप न सका हाल-ए-आरज़ू आख़िर बचे न उस निगह-ए-बद-गुमा से हम पीराना-सर भी शौक़ की हिम्मत बुलंद है ख़्वाहान-ए-काम-ए-जाँ हैं जो उस नौजवाँ से हम मायूस भी तो करते नहीं तुम ज़-राह-ए-नाज़ तंग आ गए हैं कशमकश-ए-इम्तिहाँ से हम ख़ल्वत बनेगी तेरे ग़म-ए-जाँ-नवाज़ की लेंगे ये काम अपने दिल-ए-शादमाँ से हम है इंतिहा-ए-यास भी इक इब्तिदा-ए-शौक़ फिर आ गए वहीं पे चले थे जहाँ से हम 'हसरत' फिर और जा के करें किस की बंदगी अच्छा जो सर उठाएँ भी इस आस्ताँ से हम
Hasrat Mohani
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और भी हो गए बेगाना वो ग़फ़लत कर के आज़माया जो उन्हें ज़ब्त-ए-मोहब्बत कर के दिल ने छोड़ा है न छोड़े तिरे मिलने का ख़याल बार-हा देख लिया हम ने मलामत कर के देखने आए थे वो अपनी मोहब्बत का असर कहने को ये है कि आए हैं अयादत कर के पस्ती-ए-हौसला-ए-शौक़ की अब है ये सलाह बैठ रहिए ग़म-ए-हिज्राँ पे क़नाअ'त कर के दिल ने पाया है मोहब्बत का ये आली रुत्बा आप के दर्द-ए-दवाकार की ख़िदमत कर के रूह ने पाई है तकलीफ़-ए-जुदाई से नजात आप की याद को सरमाया-ए-राहत कर के छेड़ से अब वो ये कहते हैं कि संभलों 'हसरत' सब्र ओ ताब-ए-दिल-ए-बीमार को ग़ारत कर के
Hasrat Mohani
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