ghazalKuch Alfaaz

हर एक घर में दिया भी जले अनाज भी हो अगर न हो कहीं ऐसा तो एहतिजाज भी हो रहेगी वा'दों में कब तक असीर ख़ुश-हाली हर एक बार ही कल क्यूँँ कभी तो आज भी हो न करते शोर-शराबा तो और क्या करते तुम्हारे शहर में कुछ और काम-काज भी हो हुकूमतों को बदलना तो कुछ मुहाल नहीं हुकूमतें जो बदलता है वो समाज भी हो बदल रहे हैं कई आदमी दरिंदों में मरज़ पुराना है इस का नया इलाज भी हो अकेले ग़म से नई शा'इरी नहीं होती ज़बान-ए-'मीर' में 'ग़ालिब' का इम्तिज़ाज भी हो

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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मेरे दिल में ये तेरे सिवा कौन है? तू नहीं है तो तेरी जगह कौन है? हम मोहब्बत में हारे हुए लोग हैं और मोहब्बत में जीता हुआ कौन है? मेरे पहलू से उठ के गया कौन है? तू नहीं है तो तेरी जगह कौन है? तू ने जाते हुए ये बताया नहीं मैं तेरा कौन हूँ तू मेरा कौन है

Tehzeeb Hafi

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गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया इक इश्क़ नाम का जो परिंदा ख़ला में था उतरा जो शहर में तो दुकानों में बट गया पहले तलाशा खेत फिर दरिया की खोज की बाक़ी का वक़्त गेहूँ के दानों में बट गया जब तक था आसमान में सूरज सभी का था फिर यूँँ हुआ वो चंद मकानों में बट गया हैं ताक में शिकारी निशाना हैं बस्तियाँ आलम तमाम चंद मचानों में बट गया ख़बरों ने की मुसव्वरी ख़बरें ग़ज़ल बनीं ज़िंदा लहू तो तीर कमानों में बट गया

Nida Fazli

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दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही दोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही चंद लम्हों को ही बनती हैं मुसव्विर आँखें ज़िंदगी रोज़ तो तस्वीर बनाने से रही इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी रात जंगल में कोई शम्अ' जलाने से रही फ़ासला चाँद बना देता है हर पत्थर को दूर की रौशनी नज़दीक तो आने से रही शहर में सब को कहाँ मिलती है रोने की जगह अपनी इज़्ज़त भी यहाँ हँसने हँसाने से रही

Nida Fazli

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दुख में नीर बहा देते थे सुख में हँसने लगते थे सीधे-सादे लोग थे लेकिन कितने अच्छे लगते थे नफ़रत चढ़ती आँधी जैसी प्यार उबलते चश्मों सा बैरी हूँ या संगी साथी सारे अपने लगते थे बहते पानी दुख-सुख बाँटें पेड़ बड़े बूढ़ों जैसे बच्चों की आहट सुनते ही खेत लहकने लगते थे नदिया पर्बत चाँद निगाहें माला एक कई दाने छोटे छोटे से आँगन भी कोसों फैले लगते थे

Nida Fazli

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आनी जानी हर मोहब्बत है चलो यूँ ही सही जब तलक है ख़ूब-सूरत है चलो यूँ ही सही हम कहाँ के देवता हैं बे-वफ़ा वो हैं तो क्या घर में कोई घर की ज़ीनत है चलो यूँ ही सही वो नहीं तो कोई तो होगा कहीं उस की तरह जिस्म में जब तक हरारत है चलो यूँ ही सही मैले हो जाते हैं रिश्ते भी लिबासों की तरह दोस्ती हर दिन की मेहनत है चलो यूँ ही सही भूल थी अपनी फ़रिश्ता आदमी में ढूँढ़ना आदमी में आदमिय्यत है चलो यूँ ही सही जैसी होनी चाहिए थी वैसी तो दुनिया नहीं दुनिया-दारी भी ज़रूरत है चलो यूँ ही सही

Nida Fazli

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मेरी तेरी दूरियाँ हैं अब इबादत के ख़िलाफ़ हर तरफ़ है फ़ौज-आराई मोहब्बत के ख़िलाफ़ हर्फ़-ए-सरमद ख़ून-ए-दारा के अलावा शहर में कौन है जो सर उठाए बादशाहत के ख़िलाफ़ पहले जैसा ही दुखी है आज भी बूढ़ा कबीर कोई आयत का मुख़ालिफ़ कोई मूरत के ख़िलाफ़ मैं भी चुप हूँ तू भी चुप है बात ये सच है मगर हो रहा है जो भी वो तो है तबीअत के ख़िलाफ़ मुद्दतों के बा'द देखा था उसे अच्छा लगा देर तक हँसता रहा वो अपनी आदत के ख़िलाफ़

Nida Fazli

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