ghazalKuch Alfaaz

हज़ारों दुख पड़ें सहना मोहब्बत मर नहीं सकती है तुम से बस यही कहना मोहब्बत मर नहीं सकती तिरा हर बार मेरे ख़त को पढ़ना और रो देना मिरा हर बार लिख देना मोहब्बत मर नहीं सकती किया था हम ने कैम्पस की नदी पर इक हसीं वा'दा भले हम को पड़े मरना मोहब्बत मर नहीं सकती पुराने अहद को जब ज़िंदा करने का ख़याल आए मुझे बस इतना लिख देना मोहब्बत मर नहीं सकती वो तेरा हिज्र की शब फ़ोन रखने से ज़रा पहले बहुत रोते हुए कहना मोहब्बत मर नहीं सकती गए लम्हात फ़ुर्सत के कहाँ से ढूँड कर लाऊँ वो पहरों हाथ पर लिखना मोहब्बत मर नहीं सकती

Wasi Shah7 Likes

Related Ghazal

मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

456 likes

ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

355 likes

तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

235 likes

तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

315 likes

ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

232 likes

More from Wasi Shah

समुंदर में उतरता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं तिरी आँखों को पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं तुम्हारा नाम लिखने की इजाज़त छिन गई जब से कोई भी लफ़्ज़ लिखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं तिरी यादों की ख़ुश्बू खिड़कियों में रक़्स करती है तिरे ग़म में सुलगता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं न जाने हो गया हूँ इस क़दर हस्सास मैं कब से किसी से बात करता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं मैं सारा दिन बहुत मसरूफ़ रहता हूँ मगर ज्यूँँ ही क़दम चौखट पे रखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं हर इक मुफ़्लिस के माथे पर अलम की दास्तानें हैं कोई चेहरा भी पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं बड़े लोगों के ऊँचे बद-नुमा और सर्द महलों को ग़रीब आँखों से तकता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं तिरे कूचे से अब मेरा तअ'ल्लुक़ वाजिबी सा है मगर जब भी गुज़रता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं हज़ारों मौसमों की हुक्मरानी है मिरे दिल पर 'वसी' मैं जब भी हँसता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

Wasi Shah

15 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Wasi Shah.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Wasi Shah's ghazal.