ghazalKuch Alfaaz

इश्क़ का नग़्मा जुनूँ के साज़ पर गाते हैं हम अपने ग़म की आँच से पत्थर को पिघलाते हैं हम जाग उठते हैं तो सूली पर भी नींद आती नहीं वक़्त पड़ जाए तो अंगारों पे सो जाते हैं हम ज़िंदगी को हम से बढ़ कर कौन कर सकता है प्यार और अगर मरने पे आ जाएँ तो मर जाते हैं हम दफ़्न हो कर ख़ाक में भी दफ़्न रह सकते नहीं लाला-ओ-गुल बन के वीरानों पे छा जाते हैं हम हम कि करते हैं चमन में एहतिमाम-ए-रंग-ओ-बू रू-ए-गेती से नक़ाब-ए-हुस्न सरकाते हैं हम अक्स पड़ते ही सँवर जाते हैं चेहरे के नुक़ूश शाहिद-ए-हस्ती को यूँँ आईना दिखलाते हैं हम मय-कशों को मुज़्दा सदियों के प्यासों को नवेद अपनी महफ़िल अपना साक़ी ले के अब आते हैं हम

Related Ghazal

उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

465 likes

यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

526 likes

चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

406 likes

तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

235 likes

इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

173 likes

More from Ali Sardar Jafri

अब आ गया है जहाँ में तो मुस्कुराता जा चमन के फूल दिलों के कँवल खिलाता जा अदम हयात से पहले अदम हयात के बा'द ये एक पल है उसे जावेदाँ बनाता जा भटक रही है अँधेरे में ज़िंदगी की बरात कोई चराग़ सर-ए-रहगुज़र जलाता जा गुज़र चमन से मिसाल-ए-नसीम-ए-सुब्ह-ए-बहार गुलों को छेड़ के काँटों को गुदगुदाता जा रह-ए-दराज़ है और दूर शौक़ की मंज़िल गराँ है मरहला-ए-उम्र गीत गाता जा बला से बज़्म में गर ज़ौक़-ए-नग़्मगी कम है नवा-ए-तल्ख़ को कुछ तल्ख़-तर बनाता जा जो हो सके तो बदल ज़िंदगी को ख़ुद वर्ना नज़ाद-ए-नौ को तरीक़-ए-जुनूँ सिखाता जा दिखा के जलवा-ए-फ़र्दा बना दे दीवाना नए ज़माने के रुख़ से नक़ाब उठाता जा बहुत दिनों से दिल-ओ-जाँ की महफ़िलें हैं उदास कोई तराना कोई दास्ताँ सुनाता जा

Ali Sardar Jafri

0 likes

अक़ीदे बुझ रहे हैं शम-ए-जाँ गुल होती जाती है मगर ज़ौक़-ए-जुनूँ की शो'ला-सामानी नहीं जाती ख़ुदा मालूम किस किस के लहू की लाला-कारी है ज़मीन-ए-कू-ए-जानाँ आज पहचानी नहीं जाती अगर यूँँ है तो क्यूँँ है यूँँ नहीं तो क्यूँँ नहीं आख़िर यक़ीं मोहकम है लेकिन दिल की हैरानी नहीं जाती लहू जितना था सारा सर्फ़-ए-मक़्तल हो गया लेकिन शहीदान-ए-वफ़ा के रुख़ की ताबानी नहीं जाती परेशाँ-रोज़गार आशुफ़्ता-हालाँ का मुक़द्दर है कि उस ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ की परेशानी नहीं जाती हर इक शय और महँगी और महँगी होती जाती है बस इक ख़ून-ए-बशर है जिस की अर्ज़ानी नहीं जाती नए ख़्वाबों के दिल में शो'ला-ए-ख़ुर्शीद-ए-महशर है ज़मीर-ए-हज़रत-ए-इंसाँ की सुलतानी नहीं जाती लगाते हैं लबों पर मोहर-ए-अर्बाब-ए-ज़बाँ-बंदी अली-'सरदार' की शान-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी नहीं जाती

Ali Sardar Jafri

0 likes

अक़ीदे बुझ रहे हैं शम-ए-जाँ ग़ुल होती जाती है मगर ज़ौक़-ए-जुनूँ की शोला-सामानी नहीं जाती ख़ुदा मालूम किस किस के लहू की लाला-कारी है ज़मीन-ए-कू-ए-जानाँ आज पहचानी नहीं जाती अगर यूँँ है तो क्यूँँ है यूँँ नहीं तो क्यूँँ नहीं आख़िर यक़ीं मोहकम है लेकिन ज़िद की हैरानी नहीं जाती लहू जितना था सारा सर्फ़-ए-मक़्तल हो गया लेकिन शहीदान-ए-वफ़ा के रुख़ की ताबानी नहीं जाती परेशाँ-रोज़गार आशुफ़्ता-हालाँ का मुक़द्दर है कि उस ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ की परेशानी नहीं जाती हर इक शय और महँगी और महँगी होती जाती है बस इक ख़ून-ए-बशर है जिस की अर्ज़ानी नहीं जाती ये नग़्मा नग़्मा-ए-बेदारी-ए-जम्हूर-ए-आलम है वो शमशीर-ए-नवा जिस की दरख़शानी नहीं जाती नए ख़्वाबों के दिल में शोला-ए-ख़ुर्शीद-ए-महशर है ज़मीर-ए-हज़रत-ए-इंसाँ की सुलतानी नहीं जाती लगाते हैं लबों पर मोहर अर्बाब-ए-ज़बाँ-बंदी अली-'सरदार' की शान-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी नहीं जाती

Ali Sardar Jafri

0 likes

ज़ुल्म की कुछ मीआ'द नहीं है दाद नहीं फ़रियाद नहीं है क़त्ल हुए हैं अब तक कितने कू-ए-सितम को याद नहीं है आख़िर रोएँ किस को किस को कौन है जो बर्बाद नहीं है क़ैद चमन भी बन जाता है मुर्ग़-ए-चमन आज़ाद नहीं है लुत्फ़ ही क्या गर अपने मुक़ाबिल सतवत-ए-बर्क़-ओ-बाद नहीं है सब हों शादाँ सब हों ख़ंदाँ तन्हा कोई शाद नहीं है दावत-ए-रंग-ओ-निकहत है ये ख़ंदा-ए-गुल बर्बाद नहीं है

Ali Sardar Jafri

0 likes

इक सुब्ह है जो हुई नहीं है इक रात है जो कटी नहीं है मक़्तूलों का क़हत पड़ न जाए क़ातिल की कहीं कमी नहीं है वीरानों से आ रही है आवाज़ तख़्लीक़-ए-जुनूँ रुकी नहीं है है और ही कारोबार-ए-मस्ती जी लेना तो ज़िंदगी नहीं है साक़ी से जो जाम ले न बढ़ कर वो तिश्नगी तिश्नगी नहीं है आशिक़-कुशी ओ फ़रेब-कारी ये शेवा-ए-दिलबरी नहीं है भूखों की निगाह में है बिजली ये बर्क़ अभी गिरी नहीं है दिल में जो जलाई थी किसी ने वो शम-ए-तरब बुझी नहीं है इक धूप सी है जो ज़ेर-ए-मिज़्गाँ वो आँख अभी उठी नहीं है हैं काम बहुत अभी कि दुनिया शाइस्ता-ए-आदमी नहीं है हर रंग के आ चुके हैं फ़िरऔन लेकिन ये जबीं झुकी नहीं है

Ali Sardar Jafri

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Ali Sardar Jafri.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Ali Sardar Jafri's ghazal.