ghazalKuch Alfaaz

ज़ुल्म की कुछ मीआ'द नहीं है दाद नहीं फ़रियाद नहीं है क़त्ल हुए हैं अब तक कितने कू-ए-सितम को याद नहीं है आख़िर रोएँ किस को किस को कौन है जो बर्बाद नहीं है क़ैद चमन भी बन जाता है मुर्ग़-ए-चमन आज़ाद नहीं है लुत्फ़ ही क्या गर अपने मुक़ाबिल सतवत-ए-बर्क़-ओ-बाद नहीं है सब हों शादाँ सब हों ख़ंदाँ तन्हा कोई शाद नहीं है दावत-ए-रंग-ओ-निकहत है ये ख़ंदा-ए-गुल बर्बाद नहीं है

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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अक़ीदे बुझ रहे हैं शम-ए-जाँ गुल होती जाती है मगर ज़ौक़-ए-जुनूँ की शो'ला-सामानी नहीं जाती ख़ुदा मालूम किस किस के लहू की लाला-कारी है ज़मीन-ए-कू-ए-जानाँ आज पहचानी नहीं जाती अगर यूँँ है तो क्यूँँ है यूँँ नहीं तो क्यूँँ नहीं आख़िर यक़ीं मोहकम है लेकिन दिल की हैरानी नहीं जाती लहू जितना था सारा सर्फ़-ए-मक़्तल हो गया लेकिन शहीदान-ए-वफ़ा के रुख़ की ताबानी नहीं जाती परेशाँ-रोज़गार आशुफ़्ता-हालाँ का मुक़द्दर है कि उस ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ की परेशानी नहीं जाती हर इक शय और महँगी और महँगी होती जाती है बस इक ख़ून-ए-बशर है जिस की अर्ज़ानी नहीं जाती नए ख़्वाबों के दिल में शो'ला-ए-ख़ुर्शीद-ए-महशर है ज़मीर-ए-हज़रत-ए-इंसाँ की सुलतानी नहीं जाती लगाते हैं लबों पर मोहर-ए-अर्बाब-ए-ज़बाँ-बंदी अली-'सरदार' की शान-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी नहीं जाती

Ali Sardar Jafri

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अक़ीदे बुझ रहे हैं शम-ए-जाँ ग़ुल होती जाती है मगर ज़ौक़-ए-जुनूँ की शोला-सामानी नहीं जाती ख़ुदा मालूम किस किस के लहू की लाला-कारी है ज़मीन-ए-कू-ए-जानाँ आज पहचानी नहीं जाती अगर यूँँ है तो क्यूँँ है यूँँ नहीं तो क्यूँँ नहीं आख़िर यक़ीं मोहकम है लेकिन ज़िद की हैरानी नहीं जाती लहू जितना था सारा सर्फ़-ए-मक़्तल हो गया लेकिन शहीदान-ए-वफ़ा के रुख़ की ताबानी नहीं जाती परेशाँ-रोज़गार आशुफ़्ता-हालाँ का मुक़द्दर है कि उस ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ की परेशानी नहीं जाती हर इक शय और महँगी और महँगी होती जाती है बस इक ख़ून-ए-बशर है जिस की अर्ज़ानी नहीं जाती ये नग़्मा नग़्मा-ए-बेदारी-ए-जम्हूर-ए-आलम है वो शमशीर-ए-नवा जिस की दरख़शानी नहीं जाती नए ख़्वाबों के दिल में शोला-ए-ख़ुर्शीद-ए-महशर है ज़मीर-ए-हज़रत-ए-इंसाँ की सुलतानी नहीं जाती लगाते हैं लबों पर मोहर अर्बाब-ए-ज़बाँ-बंदी अली-'सरदार' की शान-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी नहीं जाती

Ali Sardar Jafri

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अब आ गया है जहाँ में तो मुस्कुराता जा चमन के फूल दिलों के कँवल खिलाता जा अदम हयात से पहले अदम हयात के बा'द ये एक पल है उसे जावेदाँ बनाता जा भटक रही है अँधेरे में ज़िंदगी की बरात कोई चराग़ सर-ए-रहगुज़र जलाता जा गुज़र चमन से मिसाल-ए-नसीम-ए-सुब्ह-ए-बहार गुलों को छेड़ के काँटों को गुदगुदाता जा रह-ए-दराज़ है और दूर शौक़ की मंज़िल गराँ है मरहला-ए-उम्र गीत गाता जा बला से बज़्म में गर ज़ौक़-ए-नग़्मगी कम है नवा-ए-तल्ख़ को कुछ तल्ख़-तर बनाता जा जो हो सके तो बदल ज़िंदगी को ख़ुद वर्ना नज़ाद-ए-नौ को तरीक़-ए-जुनूँ सिखाता जा दिखा के जलवा-ए-फ़र्दा बना दे दीवाना नए ज़माने के रुख़ से नक़ाब उठाता जा बहुत दिनों से दिल-ओ-जाँ की महफ़िलें हैं उदास कोई तराना कोई दास्ताँ सुनाता जा

Ali Sardar Jafri

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लग़्ज़िश-ए-गाम लिए लग़्ज़िश-ए-मस्ताना लिए आए हम बज़्म में फिर जुरअत-ए-रिंदाना लिए इश्क़ पहलू में है फिर जल्वा-ए-जानाना लिए ज़ुल्फ़ इक हाथ में इक हाथ में पैमाना लिए याद करता था हमें साक़ी-ओ-मीना का हुजूम उठ गए थे जो कभी रौनक़-ए-मय-ख़ाना लिए वस्ल की सुब्ह शब-ए-हिज्र के बा'द आई है आफ़्ताब-ए-रुख़-ए-महबूब का नज़राना लिए अस्र-ए-हाज़िर को मुबारक हो नया दौर-ए-अवाम अपनी ठोकर में सर-ए-शौकत-ए-शाहाना लिए

Ali Sardar Jafri

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इक सुब्ह है जो हुई नहीं है इक रात है जो कटी नहीं है मक़्तूलों का क़हत पड़ न जाए क़ातिल की कहीं कमी नहीं है वीरानों से आ रही है आवाज़ तख़्लीक़-ए-जुनूँ रुकी नहीं है है और ही कारोबार-ए-मस्ती जी लेना तो ज़िंदगी नहीं है साक़ी से जो जाम ले न बढ़ कर वो तिश्नगी तिश्नगी नहीं है आशिक़-कुशी ओ फ़रेब-कारी ये शेवा-ए-दिलबरी नहीं है भूखों की निगाह में है बिजली ये बर्क़ अभी गिरी नहीं है दिल में जो जलाई थी किसी ने वो शम-ए-तरब बुझी नहीं है इक धूप सी है जो ज़ेर-ए-मिज़्गाँ वो आँख अभी उठी नहीं है हैं काम बहुत अभी कि दुनिया शाइस्ता-ए-आदमी नहीं है हर रंग के आ चुके हैं फ़िरऔन लेकिन ये जबीं झुकी नहीं है

Ali Sardar Jafri

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