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jahan nigar-e-sahar pairahan utarti hai vahin pe raat sitaron ka khel harti hai shab-e-visal tire dil ke saath lag kar bhi miri luti hui duniya tujhe pukarti hai shumar-e-shauq men uljhi hui shua-e-nazar hazar ruthte rangon ke ruup dharti hai ufuq se phutte mahtab ki mahak jaise sukun-e-bahr men ik lahar si ubharti hai pas-e-daricha-e-dil yad-e-bu-e-ju-e-nashat na jaane kab se khadi kakulen sanvarti hai dar-e-umid se ho kar nikalne lagta huun to yaas rauzan-e-zindan se aankh marti hai jahan se kuchh na mile husn-e-mazarat ke siva ye aarzu usi chaukhat pe shab guzarti hai jo ek jism jalati hai barq-e-abr-e-khayal to laakh zang-zada aaine nikharti hai jahan nigar-e-sahar pairahan utarti hai wahin pe raat sitaron ka khel haarti hai shab-e-visal tere dil ke sath lag kar bhi meri luti hui duniya tujhe pukarti hai shumar-e-shauq mein uljhi hui shua-e-nazar hazar ruthte rangon ke rup dhaarti hai ufuq se phutte mahtab ki mahak jaise sukun-e-bahr mein ek lahar si ubhaarti hai pas-e-daricha-e-dil yaad-e-bu-e-ju-e-nashat na jaane kab se khadi kakulen sanwarti hai dar-e-umid se ho kar nikalne lagta hun to yas rauzan-e-zindan se aankh marti hai jahan se kuchh na mile husn-e-mazarat ke siwa ye aarzu usi chaukhat pe shab guzarti hai jo ek jism jalati hai barq-e-abr-e-khayal to lakh zang-zada aaine nikhaarti hai

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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थकना भी लाज़मी था कुछ काम करते करते कुछ और थक गया हूँ आराम करते करते अंदर सब आ गया है बाहर का भी अँधेरा ख़ुद रात हो गया हूँ मैं शाम करते करते ये उम्र थी ही ऐसी जैसी गुज़ार दी है बदनाम होते होते बदनाम करते करते फँसता नहीं परिंदा है भी इसी फ़ज़ा में तंग आ गया हूँ दिल को यूँँ दाम करते करते कुछ बे-ख़बर नहीं थे जो जानते हैं मुझ को मैं कूच कर रहा था बिसराम करते करते सर से गुज़र गया है पानी तो ज़ोर करता सब रोक रुकते रुकते सब थाम करते करते किस के तवाफ़ में थे और ये दिन आ गए हैं क्या ख़ाक थी कि जिस को एहराम करते करते जिस मोड़ से चले थे पहुँचे हैं फिर वहीं पर इक राएगाँ सफ़र को अंजाम करते करते आख़िर 'ज़फ़र' हुआ हूँ मंज़र से ख़ुद ही ग़ाएब उस्लूब-ए-ख़ास अपना मैं आम करते करते

Zafar Iqbal

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