कहीं अबीर की ख़ुश्बू कहीं गुलाल का रंग कहीं पे शर्म से सिमटे हुए जमाल का रंग

Writer
Azhar Iqbal
@azhar-iqbal
14
8
Sher
6
Ghazal
0
Nazm
995 views
sherKuch Alfaaz
sherKuch Alfaaz
हर एक सम्त यहाँ वहशतों का मस्कन है जुनूँ के वास्ते सहरा ओ आशियाना क्या
sherKuch Alfaaz
हर एक शख़्स यहाँ महव-ए-ख़्वाब लगता है किसी ने हम को जगाया नहीं बहुत दिन से
sherKuch Alfaaz
न जाने ख़त्म हुई कब हमारी आज़ादी तअल्लुक़ात की पाबंदियाँ निभाते हुए
sherKuch Alfaaz
फिर इस के बा'द मनाया न जश्न ख़ुश्बू का लहू में डूबी थी फ़स्ल-ए-बहार क्या करते
sherKuch Alfaaz
ये कैफ़ियत है मेरी जान अब तुझे खो कर कि हम ने ख़ुद को भी पाया नहीं बहुत दिन से
sherKuch Alfaaz
एक मुद्दत से हैं सफ़र में हम घर में रह कर भी जैसे बेघर से
sherKuch Alfaaz
नींद आएगी भला कैसे उसे शाम के बा'द रोटियाँ भी न मुयस्सर हों जिसे काम के बा'द
sherKuch Alfaaz
है अब भी बिस्तर-ए-जाँ पर तिरे बदन की शिकन मैं ख़ुद ही मिटने लगा हूँ उसे मिटाते हुए
sherKuch Alfaaz
चले भी आओ भुला कर सभी गिले-शिकवे बरसना चाहिए होली के दिन विसाल का रंग
Similar Writers
Our suggestions based on Azhar Iqbal.







