ghazalKuch Alfaaz

ख़ुद को इतना जो हवा-दार समझ रक्खा है क्या हमें रेत की दीवार समझ रक्खा है हम ने किरदार को कपड़ों की तरह पहना है तुम ने कपड़ों ही को किरदार समझ रक्खा है मेरी संजीदा तबीअत पे भी शक है सब को बाज़ लोगों ने तो बीमार समझ रक्खा है उस को ख़ुद-दारी का क्या पाठ पढ़ाया जाए भीक को जिस ने पुरुस-कार समझ रक्खा है तू किसी दिन कहीं बे-मौत न मारा जाए तू ने यारों को मदद-गार समझ रक्खा है

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

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बड़े हिसाब से इज़्ज़त बचानी पड़ती है हमेशा झूटी कहानी सुनानी पड़ती है तुम एक बार जो टूटे तो जुड़ नहीं पाए हमें तो रोज़ ये ज़िल्लत उठानी पड़ती है मुझे ख़रीदने ऐसे भी लोग आते हैं कि जिन के कहने से क़ीमत घटानी पड़ती है मलाल ये है कि ये दोनों हाथ मेरे हैं किसी की चीज़ किसी से छुपानी पड़ती है तुम अपना नाम बता कर ही छूट जाते हो हमें तो ज़ात भी अपनी बतानी पड़ती है

Haseeb Soz

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यहाँ मज़बूत से मज़बूत लोहा टूट जाता है कई झूटे इकट्ठे हों तो सच्चा टूट जाता है न इतना शोर कर ज़ालिम हमारे टूट जाने पर कि गर्दिश में फ़लक से भी सितारा टूट जाता है तसल्ली देने वाले तो तसल्ली देते रहते हैं मगर वो क्या करे जिस का भरोसा टूट जाता है किसी से इश्क़ करते हो तो फिर ख़ामोश रहिएगा ज़रा सी ठेस से वर्ना ये शीशा टूट जाता है

Haseeb Soz

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