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बड़े हिसाब से इज़्ज़त बचानी पड़ती है हमेशा झूटी कहानी सुनानी पड़ती है तुम एक बार जो टूटे तो जुड़ नहीं पाए हमें तो रोज़ ये ज़िल्लत उठानी पड़ती है मुझे ख़रीदने ऐसे भी लोग आते हैं कि जिन के कहने से क़ीमत घटानी पड़ती है मलाल ये है कि ये दोनों हाथ मेरे हैं किसी की चीज़ किसी से छुपानी पड़ती है तुम अपना नाम बता कर ही छूट जाते हो हमें तो ज़ात भी अपनी बतानी पड़ती है

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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आईने आँख में चुभते थे बिस्तर से बदन कतराता था एक याद बसर करती थी मुझे मैं साँस नहीं ले पाता था एक शख़्स के हाथ में था सब कुछ मेरा खिलना भी मुरझाना भी रोता था तो रात उजड़ जाती हँसता था तो दिन बन जाता था मैं रब से राब्ते में रहता मुमकिन है की उस से राब्ता हो मुझे हाथ उठाना पड़ते थे तब जा कर वो फोन उठाता था मुझे आज भी याद है बचपन में कभी उस पर नजर अगर पड़ती मेरे बस्ते से फूल बरसते थे मेरी तख्ती पे दिल बन जाता था हम एक ज़िंदान में ज़िंदा थे हम एक जंजीर में बढ़े हुए एक दूसरे को देख कर हम कभी हंसते थे तो रोना आता था वो जिस्म नज़र-अंदाज़ नहीं हो पाता था इन आँखों से मुजरिम ठहराता था अपना कहने को तो घर ठहराता था

Tehzeeb Hafi

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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कोई मिसाल नहीं है तिरी मिसाल के बा'द मैं बे ख़याल हुआ हूँ तिरे ख़याल के बा'द बस इक मलाल पे तू ज़िन्दगी तमाम न कर बड़े मलाल मिलेगें मिरे मलाल के बा'द हर एक ज़ख़्म को अश्कों से धो के चूम लिया मैं ऐसे ठीक हुआ उस की देख-भाल के बा'द उलझ के रह गया वो जाल में तबीबों के मरीज़ घर नहीं लौटा है अस्पताल के बा'द दुआ सलाम से आगे मैं बढ़ नहीं पाता उसे भी सोचना पड़ता है हाल-चाल के बा'द हमारे बीच में जो है सही नहीं है वो उसे ये याद भी आया तो चार साल के बा'द हज़ारों ख़्वाब जो आँखों के आसरे थे कभी यतीम हो गए आँखों के इंतिक़ाल के बा'द

Varun Anand

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हम जी रहे हैं कोई बहाना किए बग़ैर उस के बग़ैर उस की तमन्ना किए बग़ैर अम्बार उस का पर्दा-ए-हुरमत बना मियाँ दीवार तक नहीं गिरी पर्दा किए बग़ैर याराँ वो जो है मेरा मसीहा-ए-जान-ओ-दिल बे-हद अज़ीज़ है मुझे अच्छा किए बग़ैर मैं बिस्तर-ए-ख़याल पे लेटा हूँ उस के पास सुब्ह-ए-अज़ल से कोई तक़ाज़ा किए बग़ैर उस का है जो भी कुछ है मिरा और मैं मगर वो मुझ को चाहिए कोई सौदा किए बग़ैर ये ज़िंदगी जो है उसे मअना भी चाहिए वा'दा हमें क़ुबूल है ईफ़ा किए बग़ैर ऐ क़ातिलों के शहर बस इतनी ही अर्ज़ है मैं हूँ न क़त्ल कोई तमाशा किए बग़ैर मुर्शिद के झूट की तो सज़ा बे-हिसाब है तुम छोड़ियो न शहर को सहरा किए बग़ैर उन आँगनों में कितना सुकून ओ सुरूर था आराइश-ए-नज़र तिरी पर्वा किए बग़ैर याराँ ख़ुशा ये रोज़ ओ शब-ए-दिल कि अब हमें सब कुछ है ख़ुश-गवार गवारा किए बग़ैर गिर्या-कुनाँ की फ़र्द में अपना नहीं है नाम हम गिर्या-कुन अज़ल के हैं गिर्या किए बग़ैर आख़िर हैं कौन लोग जो बख़्शे ही जाएँगे तारीख़ के हराम से तौबा किए बग़ैर वो सुन्नी बच्चा कौन था जिस की जफ़ा ने 'जौन' शीआ' बना दिया हमें शीआ' किए बग़ैर अब तुम कभी न आओगे या'नी कभी कभी रुख़्सत करो मुझे कोई वा'दा किए बग़ैर

Jaun Elia

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ख़ुद को इतना जो हवा-दार समझ रक्खा है क्या हमें रेत की दीवार समझ रक्खा है हम ने किरदार को कपड़ों की तरह पहना है तुम ने कपड़ों ही को किरदार समझ रक्खा है मेरी संजीदा तबीअत पे भी शक है सब को बाज़ लोगों ने तो बीमार समझ रक्खा है उस को ख़ुद-दारी का क्या पाठ पढ़ाया जाए भीक को जिस ने पुरुस-कार समझ रक्खा है तू किसी दिन कहीं बे-मौत न मारा जाए तू ने यारों को मदद-गार समझ रक्खा है

Haseeb Soz

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यहाँ मज़बूत से मज़बूत लोहा टूट जाता है कई झूटे इकट्ठे हों तो सच्चा टूट जाता है न इतना शोर कर ज़ालिम हमारे टूट जाने पर कि गर्दिश में फ़लक से भी सितारा टूट जाता है तसल्ली देने वाले तो तसल्ली देते रहते हैं मगर वो क्या करे जिस का भरोसा टूट जाता है किसी से इश्क़ करते हो तो फिर ख़ामोश रहिएगा ज़रा सी ठेस से वर्ना ये शीशा टूट जाता है

Haseeb Soz

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