ghazalKuch Alfaaz

हम जी रहे हैं कोई बहाना किए बग़ैर उस के बग़ैर उस की तमन्ना किए बग़ैर अम्बार उस का पर्दा-ए-हुरमत बना मियाँ दीवार तक नहीं गिरी पर्दा किए बग़ैर याराँ वो जो है मेरा मसीहा-ए-जान-ओ-दिल बे-हद अज़ीज़ है मुझे अच्छा किए बग़ैर मैं बिस्तर-ए-ख़याल पे लेटा हूँ उस के पास सुब्ह-ए-अज़ल से कोई तक़ाज़ा किए बग़ैर उस का है जो भी कुछ है मिरा और मैं मगर वो मुझ को चाहिए कोई सौदा किए बग़ैर ये ज़िंदगी जो है उसे मअना भी चाहिए वा'दा हमें क़ुबूल है ईफ़ा किए बग़ैर ऐ क़ातिलों के शहर बस इतनी ही अर्ज़ है मैं हूँ न क़त्ल कोई तमाशा किए बग़ैर मुर्शिद के झूट की तो सज़ा बे-हिसाब है तुम छोड़ियो न शहर को सहरा किए बग़ैर उन आँगनों में कितना सुकून ओ सुरूर था आराइश-ए-नज़र तिरी पर्वा किए बग़ैर याराँ ख़ुशा ये रोज़ ओ शब-ए-दिल कि अब हमें सब कुछ है ख़ुश-गवार गवारा किए बग़ैर गिर्या-कुनाँ की फ़र्द में अपना नहीं है नाम हम गिर्या-कुन अज़ल के हैं गिर्या किए बग़ैर आख़िर हैं कौन लोग जो बख़्शे ही जाएँगे तारीख़ के हराम से तौबा किए बग़ैर वो सुन्नी बच्चा कौन था जिस की जफ़ा ने 'जौन' शीआ' बना दिया हमें शीआ' किए बग़ैर अब तुम कभी न आओगे या'नी कभी कभी रुख़्सत करो मुझे कोई वा'दा किए बग़ैर

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए

Tehzeeb Hafi

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कोई हालत नहीं ये हालत है ये तो आशोब-नाक सूरत है अंजुमन में ये मेरी ख़ामोशी बुर्दबारी नहीं है वहशत है तुझ से ये गाह-गाह का शिकवा जब तलक है बसा ग़नीमत है ख़्वाहिशें दिल का साथ छोड़ गईं ये अज़िय्यत बड़ी अज़िय्यत है लोग मसरूफ़ जानते हैं मुझे याँ मिरा ग़म ही मेरी फ़ुर्सत है तंज़ पैराया-ए-तबस्सुम में इस तकल्लुफ़ की क्या ज़रूरत है हम ने देखा तो हम ने ये देखा जो नहीं है वो ख़ूब-सूरत है वार करने को जाँ-निसार आएँ ये तो ईसार है 'इनायत है गर्म-जोशी और इस क़दर क्या बात क्या तुम्हें मुझ से कुछ शिकायत है अब निकल आओ अपने अंदर से घर में सामान की ज़रूरत है आज का दिन भी 'ऐश से गुज़रा सर से पा तक बदन सलामत है

Jaun Elia

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कोई दम भी मैं कब अंदर रहा हूँ लिए हैं साँस और बाहर रहा हूँ धुएँ में साँस हैं साँसों में पल हैं मैं रौशन-दान तक बस मर रहा हूँ फ़ना हर दम मुझे गिनती रही है मैं इक दम का था और दिन भर रहा हूँ ज़रा इक साँस रोका तो लगा यूँँ कि इतनी देर अपने घर रहा हूँ ब-जुज़ अपने मुयस्सर है मुझे क्या सो ख़ुद से अपनी जेबें भर रहा हूँ हमेशा ज़ख़्म पहुँचे हैं मुझी को हमेशा मैं पस-ए-लश्कर रहा हूँ लिटा दे नींद के बिस्तर पे ऐ रात मैं दिन भर अपनी पलकों पर रहा हूँ

Jaun Elia

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तुझ में पड़ा हुआ हूँ हरकत नहीं है मुझ में हालत न पूछियो तू हालत नहीं है मुझ में अब तो नज़र में आ जा बाँहों के घर में आ जा ऐ जान तेरी कोई सूरत नहीं है मुझ में ऐ रंग रंग में आ आग़ोश-ए-तंग में आ बातें ही रंग की हैं रंगत नहीं है मुझ में अपने में ही किसी की हो रू-ब-रूई मुझ को हूँ ख़ुद से रू-ब-रू हूँ हिम्मत नहीं है मुझ में अब तो सिमट के आ जा और रूह में समा जा वैसे किसी की प्यारे वुसअ'त नहीं है मुझ में शीशे के इस तरफ़ से मैं सब को तक रहा हूँ मरने की भी किसी को फ़ुर्सत नहीं है मुझ में तुम मुझ को अपने रम में ले जाओ साथ अपने अपने से ऐ ग़ज़ालो वहशत नहीं है मुझ में

Jaun Elia

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अपनी मंज़िल का रास्ता भेजो जान हम को वहाँ बुला भेजो क्या हमारा नहीं रहा सावन ज़ुल्फ़ याँ भी कोई घटा भेजो नई कलियाँ जो अब खिली हैं वहाँ उन की ख़ुश्बू को इक ज़रा भेजो हम न जीते हैं और न मरते हैं दर्द भेजो न तुम दवा भेजो धूल उड़ती है जो उस आँगन में उस को भेजो सबा सबा भेजो ऐ फकीरो गली के उस गुल की तुम हमें अपनी ख़ाक-ए-पा भेजो शफ़क़-ए-शाम-ए-हिज्र के हाथों अपनी उतरी हुई क़बा भेजो कुछ तो रिश्ता है तुम से कम-बख़्तों कुछ नहीं कोई बद-दुआ' भेजो

Jaun Elia

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घर से हम घर तलक गए होंगे अपने ही आप तक गए होंगे हम जो अब आदमी हैं पहले कभी जाम होंगे छलक गए होंगे वो भी अब हम से थक गया होगा हम भी अब उस से थक गए होंगे शब जो हम से हुआ मुआ'फ़ करो नहीं पी थी बहक गए होंगे कितने ही लोग हिर्स-ए-शोहरत में दार पर ख़ुद लटक गए होंगे शुक्र है इस निगाह-ए-कम का मियाँ पहले ही हम खटक गए होंगे हम तो अपनी तलाश में अक्सर अज़ समा-ता-समक गए होंगे उस का लश्कर जहां-त हाँ या'नी हम भी बस बे-कुमक गए होंगे 'जौन' अल्लाह और ये आलम बीच में हम अटक गए होंगे

Jaun Elia

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