अपनी मंज़िल का रास्ता भेजो जान हम को वहाँ बुला भेजो क्या हमारा नहीं रहा सावन ज़ुल्फ़ याँ भी कोई घटा भेजो नई कलियाँ जो अब खिली हैं वहाँ उन की ख़ुश्बू को इक ज़रा भेजो हम न जीते हैं और न मरते हैं दर्द भेजो न तुम दवा भेजो धूल उड़ती है जो उस आँगन में उस को भेजो सबा सबा भेजो ऐ फकीरो गली के उस गुल की तुम हमें अपनी ख़ाक-ए-पा भेजो शफ़क़-ए-शाम-ए-हिज्र के हाथों अपनी उतरी हुई क़बा भेजो कुछ तो रिश्ता है तुम से कम-बख़्तों कुछ नहीं कोई बद-दुआ' भेजो
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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छोड़ कर जाने का दस्तूर नहीं होता था कोई भी ज़ख़्म हो नासूर नहीं होता था मेरे भी होंठ पे सिगरेट नहीं होती थी उस की भी माँग में सिंदूर नहीं होता था औरतें प्यार में तब शौक़ नहीं रखती थी आदमी इश्क़ में मज़दूर नहीं होता था
Kushal Dauneria
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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कोई हालत नहीं ये हालत है ये तो आशोब-नाक सूरत है अंजुमन में ये मेरी ख़ामोशी बुर्दबारी नहीं है वहशत है तुझ से ये गाह-गाह का शिकवा जब तलक है बसा ग़नीमत है ख़्वाहिशें दिल का साथ छोड़ गईं ये अज़िय्यत बड़ी अज़िय्यत है लोग मसरूफ़ जानते हैं मुझे याँ मिरा ग़म ही मेरी फ़ुर्सत है तंज़ पैराया-ए-तबस्सुम में इस तकल्लुफ़ की क्या ज़रूरत है हम ने देखा तो हम ने ये देखा जो नहीं है वो ख़ूब-सूरत है वार करने को जाँ-निसार आएँ ये तो ईसार है 'इनायत है गर्म-जोशी और इस क़दर क्या बात क्या तुम्हें मुझ से कुछ शिकायत है अब निकल आओ अपने अंदर से घर में सामान की ज़रूरत है आज का दिन भी 'ऐश से गुज़रा सर से पा तक बदन सलामत है
Jaun Elia
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कोई दम भी मैं कब अंदर रहा हूँ लिए हैं साँस और बाहर रहा हूँ धुएँ में साँस हैं साँसों में पल हैं मैं रौशन-दान तक बस मर रहा हूँ फ़ना हर दम मुझे गिनती रही है मैं इक दम का था और दिन भर रहा हूँ ज़रा इक साँस रोका तो लगा यूँँ कि इतनी देर अपने घर रहा हूँ ब-जुज़ अपने मुयस्सर है मुझे क्या सो ख़ुद से अपनी जेबें भर रहा हूँ हमेशा ज़ख़्म पहुँचे हैं मुझी को हमेशा मैं पस-ए-लश्कर रहा हूँ लिटा दे नींद के बिस्तर पे ऐ रात मैं दिन भर अपनी पलकों पर रहा हूँ
Jaun Elia
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अपनी मंज़िल का रास्ता भेजो जान हम को वहाँ बुला भेजो क्या हमारा नहीं रहा सावन ज़ुल्फ़ याँ भी कोई घटा भेजो नई कलियाँ जो अब खिली हैं वहाँ उन की ख़ुश्बू को इक ज़रा भेजो हम न जीते हैं और न मरते हैं दर्द भेजो न तुम दवा भेजो धूल उड़ती है जो उस आँगन में उस को भेजो सबा सबा भेजो ऐ फकीरो गली के उस गुल की तुम हमें अपनी ख़ाक-ए-पा भेजो शफ़क़-ए-शाम-ए-हिज्र के हाथों अपनी उतरी हुई क़बा भेजो कुछ तो रिश्ता है तुम से कम-बख़्तों कुछ नहीं कोई बद-दुआ' भेजो
Jaun Elia
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तुझ में पड़ा हुआ हूँ हरकत नहीं है मुझ में हालत न पूछियो तू हालत नहीं है मुझ में अब तो नज़र में आ जा बाँहों के घर में आ जा ऐ जान तेरी कोई सूरत नहीं है मुझ में ऐ रंग रंग में आ आग़ोश-ए-तंग में आ बातें ही रंग की हैं रंगत नहीं है मुझ में अपने में ही किसी की हो रू-ब-रूई मुझ को हूँ ख़ुद से रू-ब-रू हूँ हिम्मत नहीं है मुझ में अब तो सिमट के आ जा और रूह में समा जा वैसे किसी की प्यारे वुसअ'त नहीं है मुझ में शीशे के इस तरफ़ से मैं सब को तक रहा हूँ मरने की भी किसी को फ़ुर्सत नहीं है मुझ में तुम मुझ को अपने रम में ले जाओ साथ अपने अपने से ऐ ग़ज़ालो वहशत नहीं है मुझ में
Jaun Elia
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हम जी रहे हैं कोई बहाना किए बग़ैर उस के बग़ैर उस की तमन्ना किए बग़ैर अम्बार उस का पर्दा-ए-हुरमत बना मियाँ दीवार तक नहीं गिरी पर्दा किए बग़ैर याराँ वो जो है मेरा मसीहा-ए-जान-ओ-दिल बे-हद अज़ीज़ है मुझे अच्छा किए बग़ैर मैं बिस्तर-ए-ख़याल पे लेटा हूँ उस के पास सुब्ह-ए-अज़ल से कोई तक़ाज़ा किए बग़ैर उस का है जो भी कुछ है मिरा और मैं मगर वो मुझ को चाहिए कोई सौदा किए बग़ैर ये ज़िंदगी जो है उसे मअना भी चाहिए वा'दा हमें क़ुबूल है ईफ़ा किए बग़ैर ऐ क़ातिलों के शहर बस इतनी ही अर्ज़ है मैं हूँ न क़त्ल कोई तमाशा किए बग़ैर मुर्शिद के झूट की तो सज़ा बे-हिसाब है तुम छोड़ियो न शहर को सहरा किए बग़ैर उन आँगनों में कितना सुकून ओ सुरूर था आराइश-ए-नज़र तिरी पर्वा किए बग़ैर याराँ ख़ुशा ये रोज़ ओ शब-ए-दिल कि अब हमें सब कुछ है ख़ुश-गवार गवारा किए बग़ैर गिर्या-कुनाँ की फ़र्द में अपना नहीं है नाम हम गिर्या-कुन अज़ल के हैं गिर्या किए बग़ैर आख़िर हैं कौन लोग जो बख़्शे ही जाएँगे तारीख़ के हराम से तौबा किए बग़ैर वो सुन्नी बच्चा कौन था जिस की जफ़ा ने 'जौन' शीआ' बना दिया हमें शीआ' किए बग़ैर अब तुम कभी न आओगे या'नी कभी कभी रुख़्सत करो मुझे कोई वा'दा किए बग़ैर
Jaun Elia
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