nae des ka rang naya tha dharti se akash mila tha duur ke dariyaon ka sona hare samundar men girta tha chalti nadiyan gaate nauke nokon men ik shahr basa tha nauke hi men rain-basera nauke hi men din katta tha nauka hi bachchon ka jhula nauka hi piiri ka asa tha machhli jaal men tadap rahi thi nauka lahron men uljha tha hansta paani rota paani mujh ko avazen deta tha tere dhyan ki kashti le kar main ne dariya paar kiya tha nae des ka rang naya tha dharti se aakash mila tha dur ke dariyaon ka sona hare samundar mein girta tha chalti nadiyan gate nauke nokon mein ek shahr basa tha nauke hi mein rain-basera nauke hi mein din katta tha nauka hi bachchon ka jhula nauka hi piri ka asa tha machhli jal mein tadap rahi thi nauka lahron mein uljha tha hansta pani rota pani mujh ko aawazen deta tha tere dhyan ki kashti le kar main ne dariya par kiya tha
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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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याद तब करते हो करने को न हो जब कुछ भी और कहते हो तुम्हें इश्क़ है मतलब कुछ भी अब जो आ आ के बताते हो वो शख़्स ऐसा था जब मेरे साथ था वो क्यूँँ न कहा तब कुछ भी वक्फ़े-वक्फ़े से मुझे देखने आते रहना हिज्र की शब है सो हो सकता है इस शब कुछ भी
Umair Najmi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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दिल में और तो क्या रक्खा है तेरा दर्द छुपा रक्खा है इतने दुखों की तेज़ हवा में दिल का दीप जला रक्खा है धूप से चेहरों ने दुनिया में क्या अंधेर मचा रक्खा है इस नगरी के कुछ लोगों ने दुख का नाम दवा रक्खा है वादा-ए-यार की बात न छेड़ो ये धोका भी खा रक्खा है भूल भी जाओ बीती बातें इन बातों में क्या रक्खा है चुप चुप क्यूँँ रहते हो 'नासिर' ये क्या रोग लगा रक्खा है
Nasir Kazmi
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जब ज़रा तेज़ हवा होती है कैसी सुनसान फ़ज़ा होती है हम ने देखे हैं वो सन्नाटे भी जब हर इक साँस सदा होती है दिल का ये हाल हुआ तेरे बा'द जैसे वीरान सरा होती है रोना आता है हमें भी लेकिन इस में तौहीन-ए-वफ़ा होती है मुँह-अँधेरे कभी उठ कर देखो क्या तर ओ ताज़ा हवा होती है अजनबी ध्यान की हर मौज के साथ किस क़दर तेज़ हवा होती है ग़म के बे-नूर गुज़रगाहों में इक किरन ज़ौक़-फ़ज़ा होती है ग़म-गुसार-ए-सफ़र-ए-राह-ए-वफ़ा मिज़ा-ए-आबला-पा होती है गुलशन-ए-फ़िक्र की मुँह-बंद कली शब-ए-महताब में वा होती है जब निकलती है निगार-ए-शब-ए-गुल मुँह पे शबनम की रिदा होती है हादसा है कि ख़िज़ाँ से पहले बू-ए-गुल गुल से जुदा होती है इक नया दौर जनम लेता है एक तहज़ीब फ़ना होती है जब कोई ग़म नहीं होता 'नासिर' बेकली दिल की सिवा होती है
Nasir Kazmi
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तेरे आने का धोखा सा रहा है दिया सा रात भर जलता रहा है अजब है रात से आँखों का आलम ये दरिया रात भर चढ़ता रहा है सुना है रात भर बरसा है बादल मगर वो शहर जो प्यासा रहा है वो कोई दोस्त था अच्छे दिनों का जो पिछली रात से याद आ रहा है किसे ढूँडोगे इन गलियों में नासिर चलो अब घर चलें दिन जा रहा है
Nasir Kazmi
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मुसलसल बेकली दिल को रही है मगर जीने की सूरत तो रही है मैं क्यूँँ फिरता हूँ तन्हा मारा मारा ये बस्ती चैन से क्यूँँ सो रही है चले दिल से उम्मीदों के मुसाफ़िर ये नगरी आज ख़ाली हो रही है न समझो तुम इसे शोर-ए-बहाराँ ख़िज़ाँ पत्तों में छुप कर रो रही है हमारे घर की दीवारों पे 'नासिर' उदासी बाल खोले सो रही है
Nasir Kazmi
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मैं ने जब लिखना सीखा था पहले तेरा नाम लिखा था मैं वो सब्र-ए-समीम हूँ जिस ने बार-ए-अमानत सर पे लिया था मैं वो इस्म-ए-अज़ीम हूँ जिस को जिन्न-ओ-मलक ने सज्दा किया था तू ने क्यूँँ मिरा हाथ न पकड़ा मैं जब रस्ते से भटका था जो पाया है वो तेरा है जो खोया वो भी तेरा था तुझ बिन सारी उम्र गुज़ारी लोग कहेंगे तू मेरा था पहली बारिश भेजने वाले मैं तिरे दर्शन का प्यासा था
Nasir Kazmi
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