सारी दौलत तिरे क़दमों में पड़ी लगती है तू जहाँ होता है क़िस्मत भी गड़ी लगती है ऐसे रोया था बिछड़ते हुए वो शख़्स कभी जैसे सावन के महीने में झड़ी लगती है हम भी अपने को बदल डालेंगे रफ़्ता रफ़्ता अभी दुनिया हमें जन्नत से बड़ी लगती है ख़ुशनुमा लगते हैं दिल पर तिरे ज़ख़्मों के निशाँ बीच दीवार में जिस तरह घड़ी लगती है तू मिरे साथ अगर है तो अँधेरा कैसा रात ख़ुद चाँद सितारों से जड़ी लगती है मैं रहूँ या न रहूँ नाम रहेगा मेरा ज़िंदगी उम्र में कुछ मुझ से बड़ी लगती है
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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मुझ को गहराई में मिट्टी की उतर जाना है ज़िंदगी बाँध ले सामान-ए-सफ़र जाना है घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें मुझ को मत रोक मुझे लौट के घर जाना है मैं वो मेले में भटकता हुआ इक बच्चा हूँ जिस के माँ बाप को रोते हुए मर जाना है ज़िंदगी ताश के पत्तों की तरह है मेरी और पत्तों को बहर-हाल बिखर जाना है एक बे-नाम से रिश्ते की तमन्ना ले कर इस कबूतर को किसी छत पे उतर जाना है
Munawwar Rana
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मुख़्तसर होते हुए भी ज़िंदगी बढ़ जाएगी माँ की आँखें चूम लीजे रौशनी बढ़ जाएगी मौत का आना तो तय है मौत आएगी मगर आप के आने से थोड़ी ज़िंदगी बढ़ जाएगी इतनी चाहत से न देखा कीजिए महफ़िल में आप शहर वालों से हमारी दुश्मनी बढ़ जाएगी आप के हँसने से ख़तरा और भी बढ़ जाएगा इस तरह तो और आँखों की नमी बढ़ जाएगी बे-वफ़ाई खेल का हिस्सा है जाने दे इसे तज़्किरा उस से न कर शर्मिंदगी बढ़ जाएगी
Munawwar Rana
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मैं इस से पहले कि बिखरूँ इधर उधर हो जाऊँ मुझे सँभाल ले मुमकिन है दर-ब-दर हो जाऊँ ये आब-ओ-ताब जो मुझ में है सब उसी से है अगर वो छोड़ दे मुझ को तो मैं खंडर हो जाऊँ मिरी मदद से खुजूरों की फ़स्ल पकने लगे मैं चाहता हूँ कि सहरा की दोपहर हो जाऊँ मैं आस-पास के मौसम से हूँ तर-ओ-ताज़ा मैं अपने झुण्ड से निकलूँ तो बे-समर हो जाऊँ बड़ी अजीब सी हिद्दत है उस की यादों में अगर मैं छू लूँ पसीने से तर-ब-तर हो जाऊँ मैं कच्ची मिट्टी की सूरत हूँ तेरे हाथों में मुझे तू ढाल दे ऐसे कि मो'तबर हो जाऊँ बची-खुची हुई साँसों के साथ पहुँचाना सुनो हवाओ अगर मैं शिकस्ता-पर हो जाऊँ
Munawwar Rana
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भुला पाना बहुत मुश्किल है सब कुछ याद रहता है मोहब्बत करने वाला इस लिए बर्बाद रहता है अगर सोने के पिंजरे में भी रहता है तो क़ैदी है परिंदा तो वही होता है जो आज़ाद रहता है चमन में घूमने फिरने के कुछ आदाब होते हैं उधर हरगिज़ नहीं जाना उधर सय्याद रहता है लिपट जाती है सारे रास्तों की याद बचपन में जिधर से भी गुज़रता हूं मैं रस्ता याद रहता है हमें भी अपने अच्छे दिन अभी तक याद हैं 'राना' हर इक इंसान को अपना ज़माना याद रहता है
Munawwar Rana
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वो बिछड़ कर भी कहाँ मुझ से जुदा होता है रेत पर ओस से इक नाम लिखा होता है ख़ाक आँखों से लगाई तो ये एहसास हुआ अपनी मिट्टी से हर इक शख़्स जुड़ा होता है सारी दुनिया का सफ़र ख़्वाब में कर डाला है कोई मंज़र हो मिरा देखा हुआ होता है मैं भुलाना भी नहीं चाहता इस को लेकिन मुस्तक़िल ज़ख़्म का रहना भी बुरा होता है ख़ौफ़ में डूबे हुए शहर की क़िस्मत है यही मुंतज़िर रहता है हर शख़्स कि क्या होता है
Munawwar Rana
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