मुझ को गहराई में मिट्टी की उतर जाना है ज़िंदगी बाँध ले सामान-ए-सफ़र जाना है घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें मुझ को मत रोक मुझे लौट के घर जाना है मैं वो मेले में भटकता हुआ इक बच्चा हूँ जिस के माँ बाप को रोते हुए मर जाना है ज़िंदगी ताश के पत्तों की तरह है मेरी और पत्तों को बहर-हाल बिखर जाना है एक बे-नाम से रिश्ते की तमन्ना ले कर इस कबूतर को किसी छत पे उतर जाना है
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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ऐसा लगता है कि कर देगा अब आज़ाद मुझे मेरी मर्ज़ी से उड़ाने लगा सय्याद मुझे मैं हूँ सरहद पे बने एक मकाँ की सूरत कब तलक देखिए रखता है वो आबाद मुझे एक क़िस्से की तरह वो तो मुझे भूल गया इक कहानी की तरह वो है मगर याद मुझे कम से कम ये तो बता दे कि किधर जाएगी कर के ऐ ख़ाना-ख़राबी मिरी बर्बाद मुझे मैं समझ जाता हूँ इस में कोई कमज़ोरी है मेरे जिस शे'र पे मिलती है बहुत दाद मुझे
Munawwar Rana
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ये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगा लिबास-ए-ज़िंदगी फट जाएगा मैला नहीं होगा शेयर-बाज़ार में क़ीमत उछलती गिरती रहती है मगर ये ख़ून-ए-मुफ़्लिस है कभी महँगा नहीं होगा तिरे एहसास की ईंटें लगी हैं इस इमारत में हमारा घर तिरे घर से कभी ऊँचा नहीं होगा हमारी दोस्ती के बीच ख़ुद-ग़र्ज़ी भी शामिल है ये बे-मौसम का फल है ये बहुत मीठा नहीं होगा पुराने शहर के लोगों में इक रस्म-ए-मुरव्वत है हमारे पास आ जाओ कभी धोका नहीं होगा ये ऐसी चोट है जिस को हमेशा दुखते रहना है ये ऐसा ज़ख़्म है जो उम्र भर अच्छा नहीं होगा
Munawwar Rana
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फिर से बदल के मिट्टी की सूरत करो मुझे इज़्ज़त के साथ दुनिया से रुख़्सत करो मुझे मैं ने तो तुम से की ही नहीं कोई आरज़ू पानी ने कब कहा था कि शर्बत करो मुझे कुछ भी हो मुझ को एक नई शक्ल चाहिए दीवार पर बिछाओ मुझे छत करो मुझे जन्नत पुकारती है कि मैं हूँ तिरे लिए दुनिया ब-ज़िद है मुझ से कि जन्नत करो मुझे
Munawwar Rana
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ये बुत जो हम ने दोबारा बना के रक्खा है इसी ने हम को तमाशा बना के रक्खा है वो किस तरह हमें इनआ'म से नवाज़ेगा वो जिस ने हाथों को कासा बना के रक्खा है यहाँ पे कोई बचाने तुम्हें न आएगा समुंदरों ने जज़ीरा बना के रक्खा है तमाम उम्र का हासिल है ये हुनर मेरा कि मैं ने शीशे को हीरा बना के रक्खा है किसे किसे अभी सज्दा-गुज़ार होना है अमीर-ए-शहर ने खाता बना के रक्खा है मैं बच गया तो यक़ीनन ये मो'जिज़ा होगा सभी ने मुझ को निशाना बना के रक्खा है कोई बता दे ये सूरज को जा के हम ने भी शजर को धूप में छाता बना के रक्खा है
Munawwar Rana
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भुला पाना बहुत मुश्किल है सब कुछ याद रहता है मोहब्बत करने वाला इस लिए बर्बाद रहता है अगर सोने के पिंजरे में भी रहता है तो क़ैदी है परिंदा तो वही होता है जो आज़ाद रहता है चमन में घूमने फिरने के कुछ आदाब होते हैं उधर हरगिज़ नहीं जाना उधर सय्याद रहता है लिपट जाती है सारे रास्तों की याद बचपन में जिधर से भी गुज़रता हूं मैं रस्ता याद रहता है हमें भी अपने अच्छे दिन अभी तक याद हैं 'राना' हर इक इंसान को अपना ज़माना याद रहता है
Munawwar Rana
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