ऐसा लगता है कि कर देगा अब आज़ाद मुझे मेरी मर्ज़ी से उड़ाने लगा सय्याद मुझे मैं हूँ सरहद पे बने एक मकाँ की सूरत कब तलक देखिए रखता है वो आबाद मुझे एक क़िस्से की तरह वो तो मुझे भूल गया इक कहानी की तरह वो है मगर याद मुझे कम से कम ये तो बता दे कि किधर जाएगी कर के ऐ ख़ाना-ख़राबी मिरी बर्बाद मुझे मैं समझ जाता हूँ इस में कोई कमज़ोरी है मेरे जिस शे'र पे मिलती है बहुत दाद मुझे
Related Ghazal
चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
103 likes
आँख को आइना समझते हो तुम भी सबकी तरह समझते हो दोस्त अब क्यूँ नहीं समझते तुम तुम तो कहते थे ना समझते हो अपना ग़म तुम को कैसे समझाऊँ सब सेे हारा हुआ समझते हो मेरी दुनिया उजड़ गई इस में तुम इसे हादसा समझते हो आख़िरी रास्ता तो बाक़ी है आख़िरी रास्ता समझते हो
Himanshi babra KATIB
76 likes
यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
526 likes
ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
355 likes
इस तरह से न आज़माओ मुझे उस की तस्वीर मत दिखाओ मुझे ऐन मुमकिन है मैं पलट आऊँ उस की आवाज़ में बुलाओ मुझे मैं ने बोला था याद मत आना झूठ बोला था याद आओ मुझे
Ali Zaryoun
64 likes
More from Munawwar Rana
मुझ को गहराई में मिट्टी की उतर जाना है ज़िंदगी बाँध ले सामान-ए-सफ़र जाना है घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें मुझ को मत रोक मुझे लौट के घर जाना है मैं वो मेले में भटकता हुआ इक बच्चा हूँ जिस के माँ बाप को रोते हुए मर जाना है ज़िंदगी ताश के पत्तों की तरह है मेरी और पत्तों को बहर-हाल बिखर जाना है एक बे-नाम से रिश्ते की तमन्ना ले कर इस कबूतर को किसी छत पे उतर जाना है
Munawwar Rana
5 likes
छाँव मिल जाए तो कम दाम में बिक जाती है अब थकन थोड़े से आराम में बिक जाती है आप क्या मुझ को नवाज़ेंगे जनाब-ए-आली सल्तनत तक मिरे इनआ'म में बिक जाती है शे'र जैसा भी हो इस शहर में पढ़ सकते हो चाय जैसी भी हो आसाम में बिक जाती है वो सियासत का इलाक़ा है उधर मत जाना आबरू कूचा-ए-बद-नाम में बिक जाती है
Munawwar Rana
5 likes
सारी दौलत तिरे क़दमों में पड़ी लगती है तू जहाँ होता है क़िस्मत भी गड़ी लगती है ऐसे रोया था बिछड़ते हुए वो शख़्स कभी जैसे सावन के महीने में झड़ी लगती है हम भी अपने को बदल डालेंगे रफ़्ता रफ़्ता अभी दुनिया हमें जन्नत से बड़ी लगती है ख़ुशनुमा लगते हैं दिल पर तिरे ज़ख़्मों के निशाँ बीच दीवार में जिस तरह घड़ी लगती है तू मिरे साथ अगर है तो अँधेरा कैसा रात ख़ुद चाँद सितारों से जड़ी लगती है मैं रहूँ या न रहूँ नाम रहेगा मेरा ज़िंदगी उम्र में कुछ मुझ से बड़ी लगती है
Munawwar Rana
5 likes
ये बुत जो हम ने दोबारा बना के रक्खा है इसी ने हम को तमाशा बना के रक्खा है वो किस तरह हमें इनआ'म से नवाज़ेगा वो जिस ने हाथों को कासा बना के रक्खा है यहाँ पे कोई बचाने तुम्हें न आएगा समुंदरों ने जज़ीरा बना के रक्खा है तमाम उम्र का हासिल है ये हुनर मेरा कि मैं ने शीशे को हीरा बना के रक्खा है किसे किसे अभी सज्दा-गुज़ार होना है अमीर-ए-शहर ने खाता बना के रक्खा है मैं बच गया तो यक़ीनन ये मो'जिज़ा होगा सभी ने मुझ को निशाना बना के रक्खा है कोई बता दे ये सूरज को जा के हम ने भी शजर को धूप में छाता बना के रक्खा है
Munawwar Rana
3 likes
दुनिया तिरी रौनक़ से मैं अब ऊब रहा हूँ तू चाँद मुझे कहती थी मैं डूब रहा हूँ अब कोई शनासा भी दिखाई नहीं देता बरसों मैं इसी शहर का महबूब रहा हूँ मैं ख़्वाब नहीं आप की आँखों की तरह था मैं आप का लहजा नहीं उस्लूब रहा हूँ रुस्वाई मिरे नाम से मंसूब रही है मैं ख़ुद कहाँ रुस्वाई से मंसूब रहा हूँ सच्चाई तो ये है कि तिरे क़र्या-ए-दिल में इक वो भी ज़माना था कि मैं ख़ूब रहा हूँ उस शहर के पत्थर भी गवाही मिरी देंगे सहरा भी बता देगा कि मज्ज़ूब रहा हूँ दुनिया मुझे साहिल से खड़ी देख रही है मैं एक जज़ीरे की तरह डूब रहा हूँ शोहरत मुझे मिलती है तो चुप-चाप खड़ी रह रुस्वाई मैं तुझ से भी तो मंसूब रहा हूँ फेंक आए थे मुझ को भी मिरे भाई कुएँ में मैं सब्र में भी हज़रत-ए-अय्यूब रहा हूँ
Munawwar Rana
1 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Munawwar Rana.
Similar Moods
More moods that pair well with Munawwar Rana's ghazal.







