ghazalKuch Alfaaz

सूरज, सितारे चाँद मेरे साथ में रहे जब तक तुम्हारे हाथ मेरे हाथ में रहे साँसों की तरह साथ रहे सारी ज़िंदगी तुम ख़्वाब से गए तो ख़यालात में रहे हर बूँद तीर बन के उतरती है रूह में तन्हा मेरी तरह कोई बरसात में रहे हर रंग हर मिज़ाज में पाया है आप को मौसम तमाम आप की ख़िदमत में रहे शाखों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे के औक़ात में रहे

Rahat Indori28 Likes

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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इसे सामान-ए-सफ़र जान ये जुगनू रख ले राह में तीरगी होगी मिरे आँसू रख ले तू जो चाहे तो तिरा झूट भी बिक सकता है शर्त इतनी है कि सोने की तराज़ू रख ले वो कोई जिस्म नहीं है कि उसे छू भी सकें हाँ अगर नाम ही रखना है तो ख़ुश्बू रख ले तुझ को अन-देखी बुलंदी में सफ़र करना है एहतियातन मिरी हिम्मत मिरे बाज़ू रख ले मिरी ख़्वाहिश है कि आँगन में न दीवार उठे मिरे भाई मिरे हिस्से की ज़मीं तू रख ले

Rahat Indori

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ये ख़ाक-ज़ादे जो रहते हैं बे-ज़बान पड़े इशारा कर दें तो सूरज ज़मीं पे आन पड़े सुकूत-ए-ज़ीस्त को आमादा-ए-बग़ावत कर लहू उछाल कि कुछ ज़िंदगी में जान पड़े हमारे शहर की बीनाइयों पे रोते हैं तमाम शहर के मंज़र लहू-लुहान पड़े उठे हैं हाथ मिरे हुर्मत-ए-ज़मीं के लिए मज़ा जब आए कि अब पाँव आसमान पड़े किसी मकीन की आमद के इंतिज़ार में हैं मिरे मोहल्ले में ख़ाली कई मकान पड़े

Rahat Indori

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यूँँ सदा देते हुए तेरे ख़याल आते हैं जैसे का'बे की खुली छत पे बिलाल आते हैं रोज़ हम अश्कों से धो आते हैं दीवार-ए-हरम पगड़ियाँ रोज़ फ़रिश्तों की उछाल आते हैं हाथ अभी पीछे बंधे रहते हैं चुप रहते हैं देखना ये है तुझे कितने कमाल आते हैं चाँद सूरज मिरी चौखट पे कई सदियों से रोज़ लिक्खे हुए चेहरे पे सवाल आते हैं बे-हिसी मुर्दा-दिली रक़्स शराबें नग़्में बस इसी राह से क़ौमों पे ज़वाल आते हैं

Rahat Indori

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हम ने ख़ुद अपनी रहनुमाई की और शोहरत हुई ख़ुदाई की मैं ने दुनिया से मुझ से दुनिया ने सैकड़ों बार बे-वफ़ाई की खुले रहते हैं सारे दरवाज़े कोई सूरत नहीं रिहाई की टूट कर हम मिले हैं पहली बार ये शुरूआ'त है जुदाई की सोए रहते हैं ओढ़ कर ख़ुद को अब ज़रूरत नहीं रज़ाई की मंज़िलें चूमती हैं मेरे क़दम दाद दीजे शिकस्ता-पाई की ज़िंदगी जैसे-तैसे काटनी है क्या भलाई की क्या बुराई की इश्क़ के कारोबार में हम ने जान दे कर बड़ी कमाई की अब किसी की ज़बाँ नहीं खुलती रस्म जारी है मुँह-भराई की

Rahat Indori

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अपने दीवार-ओ-दर से पूछते हैं घर के हालात घर से पूछते हैं क्यूँँ अकेले हैं क़ाफ़िले वाले एक इक हम-सफ़र से पूछते हैं क्या कभी ज़िंदगी भी देखेंगे बस यही उम्र-भर से पूछते हैं जुर्म है ख़्वाब देखना भी क्या रात-भर चश्म-ए-तर से पूछते हैं ये मुलाक़ात आख़िरी तो नहीं हम जुदाई के डर से पूछते हैं ज़ख़्म का नाम फूल कैसे पड़ा तेरे दस्त-ए-हुनर से पूछते हैं कितने जंगल हैं इन मकानों में बस यही शहर भर से पूछते हैं ये जो दीवार है ये किस की है हम इधर वो उधर से पूछते हैं हैं कनीज़ें भी इस महल में क्या शाह-ज़ादों के डर से पूछते हैं क्या कहीं क़त्ल हो गया सूरज रात से रात-भर से पूछते हैं कौन वारिस है छाँव का आख़िर धूप में हम-सफ़र से पूछते हैं ये किनारे भी कितने सादा हैं कश्तियों को भँवर से पूछते हैं वो गुज़रता तो होगा अब तन्हा एक इक रहगुज़र से पूछते हैं

Rahat Indori

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