तू क़रीब आए तो क़ुर्बत का यूँँ इज़हार करूँँ आइना सामने रख कर तिरा दीदार करूँँ सामने तेरे करूँँ हार का अपनी एलान और अकेले में तिरी जीत से इनकार करूँँ पहले सोचूँ उसे फिर उस की बनाऊँ तस्वीर और फिर उस में ही पैदा दर-ओ-दीवार करूँँ मिरे क़ब्ज़े में न मिट्टी है न बादल न हवा फिर भी चाहत है कि हर शाख़ समर-बार करूँँ सुब्ह होते ही उभर आती है सालिम हो कर वही दीवार जिसे रोज़ मैं मिस्मार करूँँ
Related Ghazal
क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
371 likes
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं
Ahmad Faraz
65 likes
नया इक रिश्ता पैदा क्यूँँ करें हम बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँँ करें हम ख़मोशी से अदा हो रस्म-ए-दूरी कोई हंगामा बरपा क्यूँँ करें हम ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं वफ़ा-दारी का दावा क्यूँँ करें हम वफ़ा इख़्लास क़ुर्बानी मोहब्बत अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यूँँ करें हम हमारी ही तमन्ना क्यूँँ करो तुम तुम्हारी ही तमन्ना क्यूँँ करें हम किया था अहद जब लम्हों में हम ने तो सारी उम्र ईफ़ा क्यूँँ करें हम नहीं दुनिया को जब पर्वा हमारी तो फिर दुनिया की पर्वा क्यूँँ करें हम ये बस्ती है मुसलामानों की बस्ती यहाँ कार-ए-मसीहा क्यूँँ करें हम
Jaun Elia
67 likes
कब पानी गिरने से ख़ुशबू फूटी है मिट्टी को भी इल्म है बारिश झूठी है एक रिश्ते को लापरवाही ले डूबी एक रस्सी ढीली पड़ने पर टूटी है हाथ मिलाने पर भी उस पे खुला नहीं ये उँगली पर ज़ख़्म है या अँगूठी है उस का हँसना ना-मुमकिन था यूँँ समझो सी मेंट की दीवार से कोपल फूटी है हम ने इन पर शे'र नहीं लिक्खे हाफ़ी हम ने इन पेड़ों की इज़्ज़त लूटी है यूँँ लगता है दीन-ओ-दुनिया छूट गए मुझ से तेरे शहर की बस क्या छूटी है
Tehzeeb Hafi
90 likes
वो नहीं मेरा मगर उस से मोहब्बत है तो है ये अगर रस्मों रिवाजों से बग़ावत है तो है सच को मैं ने सच कहा जब कह दिया तो कह दिया अब ज़माने की नज़र में ये हिमाक़त है तो है कब कहा मैं ने कि वो मिल जाए मुझ को मैं उसे ग़ैर न हो जाए वो बस इतनी हसरत है तो है जल गया परवाना गर तो क्या ख़ता है शम्अ'' की रात भर जलना जलाना उस की क़िस्मत है तो है दोस्त बन कर दुश्मनों सा वो सताता है मुझे फिर भी उस ज़ालिम पे मरना अपनी फ़ितरत है तो है दूर थे और दूर हैं हर दम ज़मीन-ओ-आसमाँ दूरियों के बा'द भी दोनों में क़ुर्बत है तो है
Deepti Mishra
29 likes
More from Nida Fazli
गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया इक इश्क़ नाम का जो परिंदा ख़ला में था उतरा जो शहर में तो दुकानों में बट गया पहले तलाशा खेत फिर दरिया की खोज की बाक़ी का वक़्त गेहूँ के दानों में बट गया जब तक था आसमान में सूरज सभी का था फिर यूँँ हुआ वो चंद मकानों में बट गया हैं ताक में शिकारी निशाना हैं बस्तियाँ आलम तमाम चंद मचानों में बट गया ख़बरों ने की मुसव्वरी ख़बरें ग़ज़ल बनीं ज़िंदा लहू तो तीर कमानों में बट गया
Nida Fazli
1 likes
जाने वालों से राब्ता रखना दोस्तो रस्म-ए-फ़ातिहा रखना घर की ता'मीर चाहे जैसी हो उस में रोने की कुछ जगह रखना मस्जिदें हैं नमाज़ियों के लिए अपने घर में कहीं ख़ुदा रखना जिस्म में फैलने लगा है शहर अपनी तन्हाइयाँ बचा रखना मिलना-जुलना जहाँ ज़रूरी है मिलने-जुलने का हौसला रखना उम्र करने को है पचास को पार कौन है किस जगह पता रखना
Nida Fazli
1 likes
कुछ दिनों तो शहर सारा अजनबी सा हो गया फिर हुआ यूँँ वो किसी की मैं किसी का हो गया इश्क़ कर के देखिए अपना तो ये है तजरबा घर मोहल्ला शहर सब पहले से अच्छा हो गया क़ब्र में हक़-गोई बाहर मंक़बत क़व्वालियाँ आदमी का आदमी होना तमाशा हो गया वो ही मूरत वो ही सूरत वो ही क़ुदरत की तरह उस को जिस ने जैसा सोचा वो भी वैसा हो गया
Nida Fazli
3 likes
हर इक रस्ता अँधेरों में घिरा है मोहब्बत इक ज़रूरी हादिसा है गरजती आँधियाँ ज़ाएअ'' हुई हैं ज़मीं पे टूट के आँसू गिरा है निकल आए किधर मंज़िल की धुन में यहाँ तो रास्ता ही रास्ता है दुआ के हाथ पत्थर हो गए हैं ख़ुदा हर ज़ेहन में टूटा पड़ा है तुम्हारा तजरबा शायद अलग हो मुझे तो इल्म ने भटका दिया है
Nida Fazli
2 likes
यूँँ लग रहा है जैसे कोई आस-पास है वो कौन है जो है भी नहीं और उदास है मुमकिन है लिखने वाले को भी ये ख़बर न हो क़िस्से में जो नहीं है वही बात ख़ास है माने न माने कोई हक़ीक़त तो है यही चर्ख़ा है जिस के पास उसी की कपास है इतना भी बन-सँवर के न निकला करे कोई लगता है हर लिबास में वो बे-लिबास है छोटा बड़ा है पानी ख़ुद अपने हिसाब से उतनी ही हर नदी है यहाँ जितनी प्यास है
Nida Fazli
1 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Nida Fazli.
Similar Moods
More moods that pair well with Nida Fazli's ghazal.







