वफ़ादारों पे आफ़त आ रही है मियाँ ले लो जो क़ीमत आ रही है मैं उस से इतने वा'दे कर चुका हूँ मुझे इस बार ग़ैरत आ रही है न जाने मुझ में क्या देखा है उस ने मुझे उस पर मोहब्बत आ रही है बदलता जा रहा है झूट सच में कहानी में सदाक़त आ रही है मिरा झगड़ा ज़माने से नहीं है मिरे आड़े मोहब्बत आ रही है अभी रौशन हुआ जाता है रस्ता वो देखो एक औरत आ रही है मुझे उस की उदासी ने बताया बिछड़ जाने की साअ'त आ रही है बड़ों के दरमियाँ बैठा हुआ हूँ नसीहत पर नसीहत आ रही है
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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कोई बहाना कोई कहानी नहीं चलेगी मोहब्बतों में ग़लत-बयानी नहीं चलेगी मुनाफ़िक़ों पर वफ़ा का तमग़ा नहीं सजेगा ख़राब कपड़े पे कामदानी नहीं चलेगी हमें ये दुनिया ख़राब समझे ये उस की मर्ज़ी मगर सबूतों से छेड़खानी नहीं चलेगी बड़ों के नक्श-ए-क़दम पे बच्चे न चल सकेंगे पुरानी पटरी पे राजधानी नहीं चलेगी अगर वो अपनी ज़री की साड़ी पहन के निकली तो यार लोगों पे शेरवानी नहीं चलेगी वो महफ़िलें जो बग़ैर उजरत की खिदमतें हैं तो क्या वहाँ भी ग़ज़ल पुरानी नहीं चलेगी बहुत ज़ियादा भी मुत्मइन मत दिखाई देना बिछड़ते लम्हों में शादवानी नहीं चलेगी
Shakeel Jamali
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लोग कहते हैं कि इस खेल में सर जाते हैं इश्क़ में इतना ख़सारा है तो घर जाते हैं मौत को हम ने कभी कुछ नहीं समझा मगर आज अपने बच्चों की तरफ़ देख के डर जाते हैं ज़िंदगी ऐसे भी हालात बना देती है लोग साँसों का कफ़न ओढ़ के मर जाते हैं पाँव में अब कोई ज़ंजीर नहीं डालते हम दिल जिधर ठीक समझता है उधर जाते हैं क्या जुनूँ-ख़ेज़ मसाफ़त थी तिरे कूचे की और अब यूँँ है कि ख़ामोश गुज़र जाते हैं ये मोहब्बत की अलामत तो नहीं है कोई तेरा चेहरा नज़र आता है जिधर जाते हैं
Shakeel Jamali
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उल्टे सीधे सपने पाले बैठे हैं सब पानी में काँटा डाले बैठे हैं इक बीमार वसीयत करने वाला है रिश्ते नाते जीभ निकाले बैठे हैं अभी न जाने कितना हँसना रोना है अभी तो हम सेे पहले वाले बैठे हैं साहब-ज़ादा पिछली रात से ग़ायब है घर के अंदर रिश्ते वाले बैठे हैं अंदर डोरी टूट रही है साँसों की बाहर बीमा करने वाले बैठे हैं
Shakeel Jamali
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दिल उस की मोहब्बत में परेशान तो होगा अब आग से खेलोगे तो नुक़सान तो होगा वादे पे न आओगे तो तफ़्तीश तो होगी कानून को तोड़ोगे तो चालान तो होगा हम ने तो उसे एक अँगूठी भी नहीं दी वो ताज-महल देख के हैरान तो होगा
Shakeel Jamali
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अश्क पीने के लिए ख़ाक उड़ाने के लिए अब मिरे पास ख़ज़ाना है लुटाने के लिए ऐसी दफ़्'अ' न लगा जिस में ज़मानत मिल जाए मेरे किरदार को चुन अपने निशाने के लिए किन ज़मीनों पे उतारोगे अब इमदाद का क़हर कौन सा शहर उजाड़ोगे बसाने के लिए मैं ने हाथों से बुझाई है दहकती हुई आग अपने बच्चे के खिलौने को बचाने के लिए हो गई है मिरी उजड़ी हुई दुनिया आबाद मैं उसे ढूँढ़ रहा हूँ ये बताने के लिए नफ़रतें बेचने वालों की भी मजबूरी है माल तो चाहिए दूकान चलाने के लिए जी तो कहता है कि बिस्तर से न उतरूँ कई रोज़ घर में सामान तो हो बैठ के खाने के लिए
Shakeel Jamali
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