ye hadisa to hua hi nahin hai tere baad ghhazal kisi ko kaha hi nahin hai tere baad hai pur-sukun samundar kuchh is tarah dil ka ki jaise chand khila hi nahin hai tere baad mahakti raat se dil se qalam se kaghhaz se kisi se rabt rakha hi nahin hai tere baad khayal khvab fasane kahaniyan thiin magar vo khat tujhe bhi likha hi nahin hai tere baad kahan se mahkegi honton pe lams ki khushbu kisi ko main ne chhua hi nahin hai tere baad charaghh palkon pe 'azar' kisi ki yadon ka qasam khuda ki jala hi nahin hai tere baad ye hadisa to hua hi nahin hai tere baad ghazal kisi ko kaha hi nahin hai tere baad hai pur-sukun samundar kuchh is tarah dil ka ki jaise chand khila hi nahin hai tere baad mahakti raat se dil se qalam se kaghaz se kisi se rabt rakha hi nahin hai tere baad khayal khwab fasane kahaniyan thin magar wo khat tujhe bhi likha hi nahin hai tere baad kahan se mahkegi honton pe lams ki khushbu kisi ko main ne chhua hi nahin hai tere baad charagh palkon pe 'azar' kisi ki yaadon ka qasam khuda ki jala hi nahin hai tere baad
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ
Mehshar Afridi
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आज मैं ने उसे नज़दीक से जा देखा है वो दरीचा तो मिरे क़द से बहुत ऊँचा है अपने कमरे को अँधेरों से भरा पाया है तेरे बारे में कभी ग़ौर से जब सोचा है हर तमन्ना को रिवायत की तरह तोड़ा है तब कहीं जा के ज़माना मुझे रास आया है तुम को शिकवा है मिरे अहद-ए-मोहब्बत से मगर तुम ने पानी पे कोई लफ़्ज़ कभी लिक्खा है ऐसा बिछड़ा कि मिला ही नहीं फिर उस का पता हाए वो शख़्स जो अक्सर मुझे याद आता है कोई उस शख़्स को अपना नहीं कहता 'आज़र' अपने घर में भी वो ग़ैरों की तरह रहता है
Kafeel Aazar Amrohvi
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उस की आँखों में उतर जाने को जी चाहता है शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है किसी कम-ज़र्फ़ को बा-ज़र्फ़ अगर कहना पड़े ऐसे जीने से तो मर जाने को जी चाहता है एक इक बात में सच्चाई है उस की लेकिन अपने वा'दों से मुकर जाने को जी चाहता है क़र्ज़ टूटे हुए ख़्वाबों का अदा हो जाए ज़ात में अपनी बिखर जाने को जी चाहता है अपनी पलकों पे सजाए हुए यादों के दिए उस की नींदों से गुज़र जाने को जी चाहता है एक उजड़े हुए वीरान खंडर में 'आज़र' ना-मुनासिब है मगर जाने को जी चाहता है
Kafeel Aazar Amrohvi
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