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yuun bhi nahin ki sham-o-sahar intizar tha kahte nahin the munh se magar intizar tha muddat ke baad phuul ki surat khila tha dil shabnam ki tarah taza-o-tar intizar tha balon men dhuul paanv men chhale na the magar phir bhi kuchh ek ranj-e-safar intizar tha koi khabar thi us ki parindon ke shor men rang-e-hava men shakh-o-shajar intizar tha yuun thi javaharat lab-o-chashm ki jhalak jaise ye koi laal-o-gohar intizar tha dalan-o-dar men ek tavaqqoa thi mauj mauj divar-o-bam the ki bhanvar intizar tha aise men e'tibar kisi par na tha mujhe main bhi tha saath saath jidhar intizar tha ankhen thiin khushk khushk to dil bhi tha band band khul hi nahin raha tha kidhar intizar tha mayus hone vaale na the ham bhi ai 'zafar' aaya nahin to bar-e-digar intizar tha yun bhi nahin ki sham-o-sahar intizar tha kahte nahin the munh se magar intizar tha muddat ke baad phul ki surat khila tha dil shabnam ki tarah taza-o-tar intizar tha baalon mein dhul panw mein chhaale na the magar phir bhi kuchh ek ranj-e-safar intizar tha koi khabar thi us ki parindon ke shor mein rang-e-hawa mein shakh-o-shajar intizar tha yun thi jawaharaat lab-o-chashm ki jhalak jaise ye koi lal-o-gohar intizar tha dalan-o-dar mein ek tawaqqoa thi mauj mauj diwar-o-baam the ki bhanwar intizar tha aise mein e'tibar kisi par na tha mujhe main bhi tha sath sath jidhar intizar tha aankhen thin khushk khushk to dil bhi tha band band khul hi nahin raha tha kidhar intizar tha mayus hone wale na the hum bhi ai 'zafar' aaya nahin to bar-e-digar intizar tha

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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थकना भी लाज़मी था कुछ काम करते करते कुछ और थक गया हूँ आराम करते करते अंदर सब आ गया है बाहर का भी अँधेरा ख़ुद रात हो गया हूँ मैं शाम करते करते ये उम्र थी ही ऐसी जैसी गुज़ार दी है बदनाम होते होते बदनाम करते करते फँसता नहीं परिंदा है भी इसी फ़ज़ा में तंग आ गया हूँ दिल को यूँँ दाम करते करते कुछ बे-ख़बर नहीं थे जो जानते हैं मुझ को मैं कूच कर रहा था बिसराम करते करते सर से गुज़र गया है पानी तो ज़ोर करता सब रोक रुकते रुकते सब थाम करते करते किस के तवाफ़ में थे और ये दिन आ गए हैं क्या ख़ाक थी कि जिस को एहराम करते करते जिस मोड़ से चले थे पहुँचे हैं फिर वहीं पर इक राएगाँ सफ़र को अंजाम करते करते आख़िर 'ज़फ़र' हुआ हूँ मंज़र से ख़ुद ही ग़ाएब उस्लूब-ए-ख़ास अपना मैं आम करते करते

Zafar Iqbal

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