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Khamoshi” ke results

Sher

ख़मोशी तो यही बतला रही है उदासी रास मुझ को आ रही है मुझे जिन ग़लतियों से सीखना था वही फिर ज़िंदगी दोहरा रही है

Vishal Singh Tabish

मैं सुन रहा हूँ फ़ोन पे ख़ामोशियाँ तेरी मैं जानता हूँ आज से क्या क्या तमाम है

Aslam Rashid

उसे बेचैन कर जाऊँगा मैं भी ख़मोशी से गुज़र जाऊँगा मैं भी

Ameer Qazalbash

दबाती है गला मेरा ख़मोशी उदासी झाँकती है खिड़कियों से

Rohit Gustakh

जिन्हें सब लोग गूँगा बोलते हैं मेरे आगे वो ऊँचा बोलते हैं ख़मोशी बोलने वालों की सफ़ में हमीं सब सेे ज़ियादा बोलते हैं

Ashutosh Vdyarthi

मिरी ख़ामोशियों की झील में फिर किसी आवाज़ का पत्थर गिरा है

Aadil Raza Mansoori

बुरा मनाया था हर आहट हर सरगोशी का सोचो कितना ध्यान रखा उस ने ख़ामोशी का तुम इस का नुक़सान बताती अच्छी लगती हो वरना हम को शौक़ नहीं है सिगरेट-नोशी का

Khurram Afaq

ख़ामुशी से हुई फ़ुग़ाँ से हुई इब्तिदा रंज की कहाँ से हुई

Ada Jafarey

फिर ख़मोशी ने साज़ छेड़ा है फिर ख़यालात ने ली अँगड़ाई

Javed Akhtar

ये हासिल है मिरी ख़ामोशियों का कि पत्थर आज़माने लग गए हैं

Madan Mohan Danish

Nazm

तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचा

Kumar Vishwas

पानी कौन पकड़ सकता है जब वो इस दुनिया के शोर और ख़मोशी से क़त'अ-तअल्लुक़ होकर इंग्लिश में ग़ुस्सा करती है, मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरे की दीवारें हँसने लगती हैं वो इक ऐसी आग है जिसे सिर्फ़ दहकने

Tehzeeb Hafi

जब वो इस दुनिया के शोर और ख़ामोशी से कता तअल्लुक़ होकर इंग्लिश में ग़ुस्सा करती है, मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरें की दीवारें हँसने लगती हैं वो इक ऐसी आग है जिस को सिर्फ़ दहकने से मतलब है वो एक ऐस

Tehzeeb Hafi

"छोटी सी हँसी" सूनी सूनी थी फ़ज़ा मैं ने यूँँही उस के बालों में गुँधी ख़ामोशियों को छू लिया वो मुड़ी थोड़ा हँसी मैं भी हँसा फिर हमारे साथ नदियाँ वादियाँ कोहसार बादल फूल कोंपल शहर जंगल सब के सब हँसने

Nida Fazli

हिरास तेरे होंटों पे तबस्सुम की वो हल्की सी लकीर मेरे तख़्य्युल में रह रह के झलक उठती है यूँ अचानक तिरे आरिज़ का ख़याल आता है जैसे ज़ुल्मत में कोई शमां भड़क उठती है तेरे पैराहन-ए-रंगीं की जुन

Sahir Ludhianvi

अब सो जाओ और अपने हाथ को मेरे हाथ में रहने दो तुम चाँद से माथे वाले हो और अच्छी क़िस्मत रखते हो बच्चे की सौ भोली सूरत अब तक ज़िद करने की आदत कुछ खोई खोई सी बातें कुछ सीने में चुभती यादें अब इन

Fahmida Riaz

मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन फिर भी जब पास तू नहीं होती ख़ुद को कितना उदास पाता हूँ गुम से अपने हवा से पाता हूँ जाने क्या धुन समाई रहती है इक ख़मोशी सी छाई रहती है दिल से भी गुफ़्तुगू नहीं होती मै

Jaan Nisar Akhtar

घर बहुत से घरों में रहा हूँ मैं अब तक उन्हीं में से इक है वो दादी के क़िस्से सुनाए गए जो बड़े से मकाँ में जिसे अब पुराना कहा जा रहा है जहाँ रह रहे थे कई लोग साझे उसी की फ़ज़ाएँ थी मौजूद उसी दिन

kapil verma

तुम होती तो कैसा होता? कमरे की चार दीवारी और मैं अक्सर ये बातें करते हैं, तुम होती तो कैसा होता? इस कमरे की ज़ेबाइश क्या होती, इन दीवारों का रंग क्या होता? क्या इस ख़ाली गुलदानी में फूल गुलाबी

Shivam anand

"ज़ंजीर" हम को हमारी ज़ात ने रुसवा किया बहुत हम चाह कर भी ज़ात से आगे न जा सके उस ने हमें यूँँ बाँध रखा था कि हम कभी उस की हद-ए-निग़ाह से आगे न जा सके हम रोज़ कह रहे थे के आज़ादी चाहिए पर सच यही

Ansh Ghafil

Ghazal

नया इक रिश्ता पैदा क्यूँँ करें हम बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँँ करें हम ख़मोशी से अदा हो रस्म-ए-दूरी कोई हंगामा बरपा क्यूँँ करें हम ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं वफ़ा-दारी का दावा क्यूँ

Jaun Elia

नहीं है मुन्हसिर इस बात पर यारी हमारी के तू करता रहे नाहक़ तरफदारी हमारी अंधेरे में हमें रखना तो ख़ामोशी से रखना कही बेदार ना हो जाए बेदारी हमारी मगर अच्छा तो ये होता हम एक साथ रहते भरी रहती

Jawwad Sheikh

वो हँस के देखती होती तो उस सेे बात करते कोई उम्मीद भी होती तो उस सेे बात करते हम स्टेशन से बाहर आए इस अफ़सोस के साथ वो लड़की अजनबी होती तो उस सेे बात करते हमारे जाम आधी हौसला-अफ़ज़ाई कर पाए अगर उस न

Charagh Sharma

शहर तेरा छोड़ कर मैं जा रहा हूँ रोक ले ग़म हैं लेकिन फिर भी मैं यूँँ गा रहा हूँ रोक ले था बड़ा मुश्किल ये सब कुछ छोड़ कर जाना मगर ख़्वाबों को मैं दफ़्न कर के जा रहा हूँ रोक ले दास्ताँ इक मेरी जिस को पूर

Mahesh Natakwala

आँख की खिड़कियाँ खुली होंगी दिल में जब चोरीयाँ हुई होंगी या कहीं आइने गिरे होंगे या कहीं लड़कियाँ हँसी होंगी या कहीं दिन निकल रहा होगा या कहीं बस्तियाँ जली होंगी या कहीं हाथ हथकड़ी में क़ैद या कहीं

Tehzeeb Hafi

ज़माना आया है बे-हिजाबी का आम दीदार-ए-यार होगा सुकूत था पर्दा-दार जिस का वो राज़ अब आश्कार होगा गुज़र गया अब वो दौर साक़ी कि छुप के पीते थे पीने वाले बनेगा सारा जहान मय-ख़ाना हर कोई बादा-ख़्वार होग

Allama Iqbal

हम अपने दुख को गाने लग गए हैं मगर इस में ज़माने लग गए हैं किसी की तर्बियत का है करिश्मा ये आँसू मुस्कुराने लग गए हैं कहानी रुख़ बदलना चाहती है नए किरदार आने लग गए हैं ये हासिल है मिर

Madan Mohan Danish

तुम्हारा क्या है तुम्हें सिर्फ़ ज्ञान देना है हमारी सोचो हमें इम्तिहान देना है गुलाब भी हैं गुलाबों में ख़ार भी हैं बता निशानी देनी है या फिर निशान देना है तेरा सवाल मेरी जान का सवाल है और जवाब देने

Charagh Sharma

इस पार मैं हूँ झील के उस पार आप हैं लहरों के आइनों में लगातार आप हैं ऐ काश वो ये पूछें तुम्हें क्या पसंद है बे-साख़्ता मैं कह पड़ूँ सरकार आप हैं उस की ख़मोशियों की बलागत न पूछिए जिस के लब-ए-ख

Kashif Sayyed

कभी ख़ामोश बैठोगे कभी कुछ गुनगुनाओगे, मैं उतना याद आऊँगा मुझे जितना भुलाओगे। कोई जब पूछ बैठेगा ख़ामोशी का सबब तुम सेे, बहुत समझाना चाहोगे मगर समझा न पाओगे। कभी दुनिया मुकम्मल बन के आएगी निगाहो

Nazeer Banarasi