घर बहुत से घरों में रहा हूँ मैं अब तक उन्हीं में से इक है वो दादी के क़िस्से सुनाए गए जो बड़े से मकाँ में जिसे अब पुराना कहा जा रहा है जहाँ रह रहे थे कई लोग साझे उसी की फ़ज़ाएँ थी मौजूद उसी दिन कि जब मेरा पहली दफ़ा जन्मदिन उस खुले चौक में था मनाया सभी ने वहीं टिमटिमाती सी आँखें लिए मैं फ़लक से बरसती दु'आओं का प्यारा ज़ख़ीरा मुसलसल तके जा रहा था उन्हीं में से इक है वो इतवार की धूप कहीं छाँव में एक गद्दा बिछाए मिरे हॉस्टल से लगी छत पे लेटे थकन मैं जहाँ-भर की कम कर रहा था मिरा घर है गुमनाम सी शादियाँ भी जहाँ मैं उसी दिन बने दोस्तों को लिए साथ अपने वहीं पर बनाए नए खेल में दौड़ता खेलता बस मज़े से चहकता नज़र आ रहा था मुझे माँ की डाँटों में भी घर मिला है फिर उन सब लतीफ़ों में भी घर है जिन को बड़ा चाव ले कर सुनाते थे पापा मगर घर पुराना कई साल छूटा है पीछे अब आ कर बसे हैं हम ऐसे नए घर में जिस में खुला आसमाँ अब तके कोई ऐसी वजह ही नहीं है मगर हाँ यक़ीनन मिरा घर है ये भी है ज़ाहिर कहे हैं सभी घर इसे भी ख़मोशी में लेकिन लगा है मुझे यूँँ सभी इन घरों से कुछ आवाज़ आती हो जैसे ये मिल कर मुझे बोलते हों कि इतने घरों में मैं ही रह रहा हूँ या घर ये मुझी में बसर कर रहे हैं
nazmKuch Alfaaz
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