ghazalKuch Alfaaz
शहर तेरा छोड़ कर मैं जा रहा हूँ रोक ले ग़म हैं लेकिन फिर भी मैं यूँँ गा रहा हूँ रोक ले था बड़ा मुश्किल ये सब कुछ छोड़ कर जाना मगर ख़्वाबों को मैं दफ़्न कर के जा रहा हूँ रोक ले दास्ताँ इक मेरी जिस को पूरा होना था कभी मैं अधूरा छोड़ उस को जा रहा हूँ रोक ले मैं पलट सकता हूँ तू आवाज़ तो दे इक दफ़ा मैं ख़मोशी तेरी अब सुन पा रहा हूँ रोक ले देखा था इक बार मैं ने उस को यूँँ हँसते हुए नग़्में उस के अब तलक मैं गा रहा हूँ रोक ले
Mahesh Natakwala5 Likes







