आज भी गूँज उठती है भीतर कहीं वो सदा जो तुझे मैं ने दी ही नहीं
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जा तुझे जाने दिया जानाँ मेरी जानाँ जान अब तू हो गई अनजान हो जैसे
nakul kumar
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तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी
Tehzeeb Hafi
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घर में भी दिल नहीं लग रहा काम पर भी नहीं जा रहा जाने क्या ख़ौफ़ है जो तुझे चूम कर भी नहीं जा रहा रात के तीन बजने को है यार ये कैसा महबूब है जो गले भी नहीं लग रहा और घर भी नहीं जा रहा
Tehzeeb Hafi
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गले तो लगना है उस से कहो अभी लग जाए यही न हो मेरा उस के बग़ैर जी लग जाए मैं आ रहा हूँ तेरे पास ये न हो कि कहीं तेरा मज़ाक़ हो और मेरी ज़िंदगी लग जाए
Tehzeeb Hafi
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पलक का बाल गिरे कब मैं कब तुझे माँगूँ मैं कशमकश में ये पलकें न नोच लूँ अपनी
Vishnu virat
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ज़ेहन-ओ-दिल में मेरे पेच है इक फँसी तुझ को जाना है तो जा चला जा अभी इश्क़ है तुझ सेे या है महज़ दिल-लगी तुझ को जाना है तो जा चला जा अभी ये तअल्लुक़ भी आसाँ नहीं हम-सफ़र मोड़ आने हैं आएँगे आगे मगर घर पलटने का ये मोड़ है आख़िरी तुझ को जाना है तो जा चला जा अभी
Mohit Dixit
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ये शहर आम सा ही शहर है बहिश्त नहीं बस इक अज़ीज़ रहा करता था यहाँ मेरा
Mohit Dixit
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इस कहानी में कहीं नाम हमारा भी तो था उस सेे कहना कि सिकन्दर कभी हारा भी तो था
Mohit Dixit
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गईं जो सर्दियाँ दरख़्त सूखने लगे हवा भी चीखने लगी ये दिन उदास हैं इन्हीं दिनों की इक सहर जुदा हुए थे हम इसीलिए तो आज भी ये दिन उदास हैं
Mohit Dixit
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इक हुस्न-ए-बे-मिसाल है मेरी निगाह में देखो उस ओर मेरा इशारा है उस तरफ़ अब नाव अपनी डूबने वाली है साथियों जो तैर सकते हो तो किनारा है उस तरफ़
Mohit Dixit
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