आज मग़्मूम क्यूँँ हो ऐ 'ताबाँ' कुछ तो बोलो कि माजरा क्या है
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सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ
Khwaja Meer Dard
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इलाज अपना कराते फिर रहे हो जाने किस किस से मोहब्बत कर के देखो ना मोहब्बत क्यूँँ नहीं करते
Farhat Ehsaas
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मैं क्या कहूँ के मुझे सब्र क्यूँँ नहीं आता मैं क्या करूँँ के तुझे देखने की आदत है
Ahmad Faraz
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तुम उन के वा'दे का ज़िक्र उन से क्यूँँ करो 'ग़ालिब' ये क्या कि तुम कहो और वो कहें कि याद नहीं
Mirza Ghalib
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कौन सी बात है तुम में ऐसी इतने अच्छे क्यूँँ लगते हो
Mohsin Naqvi
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तू उस निगाह से पी वक़्त-ए-मय-कशी 'ताबाँ' की जिस निगाह पे क़ुर्बान पारसाई हो
Anwar Taban
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सुकून क़ल्ब को जिस से मिल जाए 'ताबाँ' ग़ज़ल कोई ऐसी सुना दीजिएगा
Anwar Taban
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शग़्ल था दश्त-नवर्दी का कभी ऐ 'ताबाँ' अब गुलिस्ताँ में भी जाते हुए डर लगता है
Anwar Taban
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समझ से काम जो लेता हर एक बशर 'ताबाँ' न हाहा-कार ही मचते न घर जला करते
Anwar Taban
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सितम भी मुझ पे वो करता रहा करम की तरह वो मेहरबाँ तो न था मेहरबान जैसा था
Anwar Taban
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