hamaari rooh ko us waqt apnaa irfaan haasil hota hai, jab hum kisi mufakkir se rushanaas hote hain. jab tak main goete ke tasawwuraat ki la-mutanaahiyat se be-khabar tha. us waqt tak main apni kam-maaegi par muttala na tha.
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किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
Ahmad Faraz
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जिस को ख़ुद मैं ने भी अपनी रूह का इरफ़ाँ समझा था वो तो शायद मेरे प्यासे होंटों की शैतानी थी
Jaun Elia
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ये कभी मिलने चले आऍंगे सदियों बा'द भी वक़्त के पन्नों में कुछ लम्हात रख कर देखिए
nakul kumar
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तुम्हें ये ग़म है कि अब चिट्ठियाँ नहीं आती हमारी सोचो हमें हिचकियाँ नहीं आती
Charagh Sharma
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मुझ को बदन नसीब था पर रूह के बग़ैर उस ने दिया भी फूल तो ख़ुशबू निकाल कर
Ankit Maurya
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वतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली है तेरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में
Allama Iqbal
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यक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलम जिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरें
Allama Iqbal
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ढूँढ़ता फिरता हूँ मैं 'इक़बाल' अपने आप को आप ही गोया मुसाफ़िर आप ही मंज़िल हूँ मैं
Allama Iqbal
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जीना वो क्या जो हो नफ़स-ए-ग़ैर पर मदार शोहरत की ज़िंदगी का भरोसा भी छोड़ दे
Allama Iqbal
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दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूँ या रब क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो
Allama Iqbal
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