ग़म में हम सूरत-ए-गमख़ार नहीं पढ़ते हैं इस लिए मीर के अश'आर नहीं पढ़ते हैं मेरी आँखें तेरी तस्वीर से जा लगती हैं सुब्ह उठकर सभी अख़बार नहीं पढ़ते हैं
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
Bashir Badr
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है
Shabeena Adeeb
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कुछ वक़्त ने तोड़ा है भरम और कुछ उस ने मैं तो ये समझता था कोई बात है मुझ में
Ashu Mishra
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पुरानी चाहत के ज़ख़्म अब तक भरे नहीं हैं और एक लड़की पड़ी है पीछे बड़े जतन से
Ashu Mishra
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और अब दुनिया मेरी तन्हाई में देती है दख़्ल मैं भी पत्थर फेंकता रहता था ठहरी झील पर
Ashu Mishra
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अवल्ली इश्क़ के एहसास भी तारी रक्खे और इस बीच नए काम भी जारी रक्खे मैं ने दिल रख लिया है ये भी कोई कम तो नहीं दूसरा ढूँढ़ लो जो बात तुम्हारी रक्खे
Ashu Mishra
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तुम्हारी शक्ल किसी शक्ल से मिलाते हुए मैं खो गया हूँ नया रास्ता बनाते हुए
Ashu Mishra
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