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कैसा मंज़र था उन की आँखों में इक समुंदर था उन की आँखों में

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इन आँखों को तुम्हारे हिज्र में बीमार करने की रही हसरत न कोई अब तुम्हें यूँँ प्यार करने की

Hameed Sarwar Bahraichi

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कमाल ये नहीं उस को भुला चुका हूँ मैं कमाल ये है बहुत दूर जा चुका हूँ मैं वो छोड़ कर के गया जिस मुक़ाम पर मुझ को उसी मुक़ाम को मंज़िल बना चुका हूँ मैं

Hameed Sarwar Bahraichi

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हमारे ख़्वाब समुंदर में डूब जाते हैं सो अपने ख़्वाब में हम कश्तियाँ बनाते हैं

Hameed Sarwar Bahraichi

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ईमान की दौलत का असर सूख रहा है क्या बात कि सर सब्ज़ शजर सूख रहा है आराम नहीं ज़ीस्त को ज़िंदान में सरवर हर लम्हा मेरा कस्ब-ए-हुनर सूख रहा है

Hameed Sarwar Bahraichi

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हम मुनाफ़िक़ की किसी बात में आएँगे नहीं चाहे तन्हा रहें जज़्बात में आएँगे नहीं ज़र्फ़ वाले हैं मुहब्बत है हमारा पेशा या'नी कुछ भी हो ख़ुराफ़ात में आएँगे नहीं

Hameed Sarwar Bahraichi

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