रहते थे कभी जिन के दिल में हम जान से भी प्यारों की तरह बैठे हैं उन्हीं के कूचे में हम आज गुनहगारों की तरह
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
Mirza Ghalib
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ये अलग बात कि ख़ामोश खड़े रहते हैं फिर भी जो लोग बड़े हैं, वो बड़े रहते हैं
Rahat Indori
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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सुनते हैं कि काँटे से गुल तक हैं राह में लाखों वीराने कहता है मगर ये अज़्म-ए-जुनूँ सहरा से गुलिस्ताँ दूर नहीं
Majrooh Sultanpuri
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अब कारगह-ए-दहर में लगता है बहुत दिल ऐ दोस्त कहीं ये भी तिरा ग़म तो नहीं है
Majrooh Sultanpuri
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इस बाग़ में वो संग के क़ाबिल कहा न जाए जब तक किसी समर को मेरा दिल कहा न जाए
Majrooh Sultanpuri
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मेरे ही संग-ओ-ख़िश्त से ता'मीर-ए-बाम-ओ-दर मेरे ही घर को शहर में शामिल कहा न जाए
Majrooh Sultanpuri
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देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख
Majrooh Sultanpuri
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