ज़ख़्मी से दिन हैं आजकल 'कालिख़' यहाँ तुम याद जाने इस क़दर क्यूँँ आ रहे
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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ये अलग बात कि ख़ामोश खड़े रहते हैं फिर भी जो लोग बड़े हैं, वो बड़े रहते हैं
Rahat Indori
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जानता हूँ कि तुझे साथ तो रखते हैं कई पूछना था कि तेरा ध्यान भी रखता है कोई?
Umair Najmi
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या
Mirza Ghalib
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यहाँ चेहरे सभी जैसे भरी ‘कालिख़’ बचे कुछ साफ़ उन में रंग भरने दो
Saurabh Yadav Kaalikhh
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कहो यार 'कालिख़' कि क्या ही करोगे मुसलसल करेंगे सफ़र ज़िंदगी भर
Saurabh Yadav Kaalikhh
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मुझे था लगा सब सही चल रहा सही चल रहा था मगर कट गया मेरा था कभी कट चुका इस लिए न फिर से कटेगा मगर कट गया
Saurabh Yadav Kaalikhh
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रूह सारी सर-ख़ुशी से छोड़ती सारे बदन सोगवारी बेवजह सारी यहाँ घर घर चले
Saurabh Yadav Kaalikhh
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रूह सारी सर-ख़ुशी से छोड़ती सारे बदन सोगवारी बेवजह सारी यहाँ घर घर चले
Saurabh Yadav Kaalikhh
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