ghazalKuch Alfaaz

आग है फैली हुई काली घटाओं की जगह बद-दुआएँ हैं लबों पर अब दु'आओं की जगह इंतिख़ाब-ए-अहल-ए-गुलशन पर बहुत रोता है दिल देख कर ज़ाग़-ओ-ज़ग़्न को ख़ुश-नवाओं की जगह कुछ भी होता पर न होते पारा-पारा जिस्म-ओ-जाँ राहज़न होते अगर उन रहनुमाओं की जगह लुट गई इस दौर में अहल-ए-क़लम की आबरू बिक रहे हैं अब सहाफ़ी बेसवाओं की जगह कुछ तो आता हम को भी जाँ से गुज़रने का मज़ा ग़ैर होते काश 'जालिब' आश्नाओं की जगह

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झुक के चलता हूँ कि क़द उस के बराबर न लगे दूसरा ये कि उसे राह में ठोकर न लगे ये तेरे साथ तअ'ल्लुक़ का बड़ा फ़ाइदा है आदमी हो भी तो औक़ात से बाहर न लगे नीम तारीक सा माहौल है दरकार मुझे ऐसा माहौल जहाँ आँख लगे डर न लगे माँओं ने चूमना होते हैं बुरीदा सर भी उस से कहना कि कोई ज़ख़्म जबीं पर न लगे ये तलबगार निगाहों के तक़ाज़े हर सू कोई तो ऐसी जगह हो जो मुझे घर न लगे ये जो आईना है देखूँ तो ख़ला दिखता है इस जगह कुछ भी न लगवाऊँ तो बेहतर न लगे तुम ने छोड़ा तो किसी और से टकराऊँगा मैं कैसे मुमकिन है कि अंधे का कहीं सर न लगे

Umair Najmi

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तुम को वेहशत तो सीखा दी गुजारें लाइक़ और कोई हुक्म कोई काम हमारे लाइक़ माजरत में तो किसी और के मसरफ में हुं ढूंढ देता हु मगर कोई तुम्हारे लाइक़ एक दो ज़ख़्मों की गहराई और आँखों के खंडर और कुछ ख़ास नहीं मुझ में नज़ारे लाइक़ घोंसला छाव हरा रंग समर कुछ भी नहीं देख मुझ जैसे शजर होते है आरे लाइक़ इस इलाक़े में उजालों की जगह कोई नहीं सिर्फ़ परचम है यहाँ चाँद सितारे लाइक़ मुझ निक्क में को चुना उस ने तरस खा के उमेर देखते रह गए हसरत से बेचारे लाइक़

Umair Najmi

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दश्त में प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं हम परिंदे कहीं जाते हुए मर जाते हैं हम हैं सूखे हुए तालाब पे बैठे हुए हंस जो तअल्लुक़ को निभाते हुए मर जाते हैं घर पहुँचता है कोई और हमारे जैसा हम तेरे शहर से जाते हुए मर जाते हैं किस तरह लोग चले जाते हैं उठ कर चुप -चाप हम तो ये ध्यान में लेट हुए मर जाते हैं उन के भी क़त्ल का इल्ज़ाम हमारे सर है जो हमें ज़हर पिलाते हुए मर जाते हैं ये मोहब्बत की कहानी नहीं मरती लेकिन लोग किरदार निभाते हुए मर जाते हैं हम हैं वो टूटी हुई कश्तियों वाले 'ताबिश ' जो किनारों को मिलाते हुए मर जाते हैं

Abbas Tabish

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टूटने पर कोई आए तो फिर ऐसा टूटे कि जिसे देख के हर देखने वाला टूटे अपने बिखरे हुए टुकड़ों को समेटे कब तक एक इंसान की ख़ातिर कोई कितना टूटे कोई टुकड़ा तेरी आँखों में न चुभ जाए कहीं दूर हो जा कि मेरे ख़्वाब का शीशा टूटे मैं किसी और को सोचूँ तो मुझे होश आए मैं किसी और को देखूँ तो ये नश्शा टूटे रंज होता है तो ऐसा कि बताए न बने जब किसी अपने के बाइ'से कोई अपना टूटे पास बैठे हुए यारों को ख़बर तक न हुई हम किसी बात पे इस दर्जा अनोखा टूटे इतनी जल्दी तो सँभलने की तवक़्क़ो' न करो वक़्त ही कितना हुआ है मेरा सपना टूटे दाद की भीक न माँग ऐ मेरे अच्छे शाएर जा तुझे मेरी दुआ है तेरा कासा टूटे तू उसे किस के भरोसे पे नहीं कात रही चर्ख़ को देखने वाली तेरा चर्ख़ा टूटे वर्ना कब तक लिए फिरता रहूँ उस को 'जव्वाद' कोई सूरत हो कि उम्मीद से रिश्ता टूटे

Jawwad Sheikh

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हालत जो हमारी है तुम्हारी तो नहीं है ऐसा है तो फिर ये कोई यारी तो नहीं है तहक़ीर ना कर ये मेरी उधड़ी हुई गुदड़ी जैसी भी है अपनी है उधारी तो नहीं है तन्हा ही सही लड़ तो रही है वो अकेली बस थक के गिरी है अभी हारी तो नहीं है ये तू जो मोहब्बत में सिला माँग रहा है ऐ शख़्स तू अंदर से भिखारी तो नहीं है जितनी भी कमा ली हो बना ली हो ये दुनिया दुनिया है तो फिर दोस्त तुम्हारी तो नहीं है

Ali Zaryoun

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उस ने जब हँस के नमस्कार किया मुझ को इंसान से अवतार किया दश्त-ए-ग़ुर्बत में दिल-ए-वीराँ ने याद जमुना को कई बार किया प्यार की बात न पूछो यारो हम ने किस किस से नहीं प्यार किया कितनी ख़्वाबीदा तमन्नाओं को उस की आवाज़ ने बेदार किया हम पुजारी हैं बुतों के 'जालिब' हम ने का'बे में भी इक़रार किया

Habib Jalib

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फिर दिल से आ रही है सदा उस गली में चल शायद मिले ग़ज़ल का पता उस गली में चल कब से नहीं हुआ है कोई शे'र काम का ये शे'र की नहीं है फ़ज़ा उस गली में चल वो बाम ओ दर वो लोग वो रुस्वाइयों के ज़ख़्म हैं सब के सब अज़ीज़ जुदा उस गली में चल उस फूल के बग़ैर बहुत जी उदास है मुझ को भी साथ ले के सबा उस गली में चल दुनिया तो चाहती है यूँँही फ़ासले रहें दुनिया के मशवरों पे न जा उस गली में चल बे-नूर ओ बे-असर है यहाँ की सदा-ए-साज़ था उस सुकूत में भी मज़ा उस गली में चल 'जालिब' पुकारती हैं वो शोला-नवाइयाँ ये सर्द रुत ये सर्द हवा उस गली में चल

Habib Jalib

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जीवन मुझ से मैं जीवन से शरमाता हूँ मुझ से आगे जाने वालो में आता हूँ जिन की यादों से रौशन हैं मेरी आँखें दिल कहता है उन को भी मैं याद आता हूँ सुर से साँसों का नाता है तोड़ूँ कैसे तुम जलते हो क्यूँँ जीता हूँ क्यूँँ गाता हूँ तुम अपने दामन में सितारे बैठ कर टाँको और मैं नए बरन लफ़्ज़ों को पहनाता हूँ जिन ख़्वाबों को देख के मैं ने जीना सीखा उन के आगे हर दौलत को ठुकराता हूँ ज़हर उगलते हैं जब मिल कर दुनिया वाले मीठे बोलों की वादी में खो जाता हूँ 'जालिब' मेरे शे'र समझ में आ जाते हैं इसी लिए कम-रुत्बा शाएर कहलाता हूँ

Habib Jalib

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फ़ैज़' और 'फ़ैज़' का ग़म भूलने वाला है कहीं मौत ये तेरा सितम भूलने वाला है कहीं हम से जिस वक़्त ने वो शाह-ए-सुख़न छीन लिया हम को वो वक़्त-ए-अलम भूलने वाला है कहीं तिरे अश्क और भी चमकाएँगी यादें उस की हम को वो दीदा-ए-नम भूलने वाला है कहीं कभी ज़िंदाँ में कभी दूर वतन से ऐ दोस्त जो किया उस ने रक़म भूलने वाला है कहीं आख़िरी बार उसे देख न पाए 'जालिब' ये मुक़द्दर का सितम भूलने वाला है कहीं

Habib Jalib

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वो देखने मुझे आना तो चाहता होगा मगर ज़माने की बातों से डर गया होगा उसे था शौक़ बहुत मुझ को अच्छा रखने का ये शौक़ औरों को शायद बुरा लगा होगा कभी न हद्द-ए-अदब से बढ़े थे दीदा ओ दिल वो मुझ से किस लिए किसी बात पर ख़फ़ा होगा मुझे गुमान है ये भी यक़ीन की हद तक किसी से भी न वो मेरी तरह मिला होगा कभी कभी तो सितारों की छाँव में वो भी मिरे ख़याल में कुछ देर जागता होगा वो उस का सादा ओ मासूम वालेहाना-पन किसी भी जुग में कोई देवता भी क्या होगा नहीं वो आया तो 'जालिब' गिला न कर उस का न-जाने क्या उसे दरपेश मसअला होगा

Habib Jalib

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