ghazalKuch Alfaaz

जीवन मुझ से मैं जीवन से शरमाता हूँ मुझ से आगे जाने वालो में आता हूँ जिन की यादों से रौशन हैं मेरी आँखें दिल कहता है उन को भी मैं याद आता हूँ सुर से साँसों का नाता है तोड़ूँ कैसे तुम जलते हो क्यूँँ जीता हूँ क्यूँँ गाता हूँ तुम अपने दामन में सितारे बैठ कर टाँको और मैं नए बरन लफ़्ज़ों को पहनाता हूँ जिन ख़्वाबों को देख के मैं ने जीना सीखा उन के आगे हर दौलत को ठुकराता हूँ ज़हर उगलते हैं जब मिल कर दुनिया वाले मीठे बोलों की वादी में खो जाता हूँ 'जालिब' मेरे शे'र समझ में आ जाते हैं इसी लिए कम-रुत्बा शाएर कहलाता हूँ

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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आग है फैली हुई काली घटाओं की जगह बद-दुआएँ हैं लबों पर अब दु'आओं की जगह इंतिख़ाब-ए-अहल-ए-गुलशन पर बहुत रोता है दिल देख कर ज़ाग़-ओ-ज़ग़्न को ख़ुश-नवाओं की जगह कुछ भी होता पर न होते पारा-पारा जिस्म-ओ-जाँ राहज़न होते अगर उन रहनुमाओं की जगह लुट गई इस दौर में अहल-ए-क़लम की आबरू बिक रहे हैं अब सहाफ़ी बेसवाओं की जगह कुछ तो आता हम को भी जाँ से गुज़रने का मज़ा ग़ैर होते काश 'जालिब' आश्नाओं की जगह

Habib Jalib

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हम ने दिल से तुझे सदा माना तू बड़ा था तुझे बड़ा माना 'मीर'-ओ-'ग़ालिब' के बा'द 'अनीस' के बा'द तुझ को माना बड़ा बजा माना तू कि दीवाना-ए-सदाक़त था तू ने बंदे को कब ख़ुदा माना तुझ को पर्वा न थी ज़माने की तू ने दिल ही का हर कहा माना तुझ को ख़ुद पे था ए'तिमाद इतना ख़ुद ही को तो न रहनुमा माना की न शब की कभी पज़ीराई सुब्ह को लाएक़-ए-सना माना हँस दिया सत्ह-ए-ज़ेहन-ए-आलम पर जब किसी बात का बुरा माना यूँँ तो शाइ'र थे और भी ऐ 'जोश' हम ने तुझ सा न दूसरा माना

Habib Jalib

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अपनों ने वो रंग दिए हैं, बेगाने याद आते हैं देख के इस बस्ती की हालत वीराने याद आते हैं इस नगरी में क़दम- क़दम पे सर को झुकाना पड़ता है इस नगरी में क़दम-क़दम पर बुतख़ाने याद आते हैं आँखें पुरनम हो जाती हैं ग़ुरबत के सेहराओं में जब उस रिमझिम की वादी के अफ़साने याद आते हैं ऐसे-ऐसे दर्द मिले हैं नए दयारों में हम को बिछड़े हुए कुछ लोग, पुराने याराने याद आते हैं जिन के कारन आज हमारे हाल पे दुनिया हंसती है कितने ज़ालिम चेहरे जाने-पहचाने याद आते हैं यूँ न लुटी थी गलियों-गलियों दौलत अपने अश्क़ों की रोते हैं तो हम को अपने ग़मख़ाने याद आते हैं कोई तो परचम ले कर निकले अपने गरेबां का जालिब चारों जानिब सन्नाटा है, दीवाने याद आते हैं

Habib Jalib

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कौन बताए कौन सुझाए कौन से देस सिधार गए उन का रस्ता तकते तकते नैन हमारे हार गए काँटों के दुख सहने में तस्कीन भी थी आराम भी था हँसने वाले भोले-भाले फूल चमन के मार गए एक लगन की बात है जीवन एक लगन ही जीवन है पूछ न क्या खोया क्या पाया क्या जीते क्या हार गए आने वाली बरखा देखें क्या दिखलाए आँखों को ये बरखा बरसाते दिन तो बिन प्रीतम बे-कार गए जब भी लौटे प्यार से लौटे फूल न पा कर गुलशन में भँवरे अमृत रस की धुन में पल पल सौ सौ बार गए हम से पूछो साहिल वालो क्या बीती दुखियारों पर खेवन-हारे बीच भँवर में छोड़ के जब उस पार गए

Habib Jalib

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उस ने जब हँस के नमस्कार किया मुझ को इंसान से अवतार किया दश्त-ए-ग़ुर्बत में दिल-ए-वीराँ ने याद जमुना को कई बार किया प्यार की बात न पूछो यारो हम ने किस किस से नहीं प्यार किया कितनी ख़्वाबीदा तमन्नाओं को उस की आवाज़ ने बेदार किया हम पुजारी हैं बुतों के 'जालिब' हम ने का'बे में भी इक़रार किया

Habib Jalib

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