अपनों ने वो रंग दिए हैं, बेगाने याद आते हैं देख के इस बस्ती की हालत वीराने याद आते हैं इस नगरी में क़दम- क़दम पे सर को झुकाना पड़ता है इस नगरी में क़दम-क़दम पर बुतख़ाने याद आते हैं आँखें पुरनम हो जाती हैं ग़ुरबत के सेहराओं में जब उस रिमझिम की वादी के अफ़साने याद आते हैं ऐसे-ऐसे दर्द मिले हैं नए दयारों में हम को बिछड़े हुए कुछ लोग, पुराने याराने याद आते हैं जिन के कारन आज हमारे हाल पे दुनिया हंसती है कितने ज़ालिम चेहरे जाने-पहचाने याद आते हैं यूँ न लुटी थी गलियों-गलियों दौलत अपने अश्क़ों की रोते हैं तो हम को अपने ग़मख़ाने याद आते हैं कोई तो परचम ले कर निकले अपने गरेबां का जालिब चारों जानिब सन्नाटा है, दीवाने याद आते हैं
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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आग है फैली हुई काली घटाओं की जगह बद-दुआएँ हैं लबों पर अब दु'आओं की जगह इंतिख़ाब-ए-अहल-ए-गुलशन पर बहुत रोता है दिल देख कर ज़ाग़-ओ-ज़ग़्न को ख़ुश-नवाओं की जगह कुछ भी होता पर न होते पारा-पारा जिस्म-ओ-जाँ राहज़न होते अगर उन रहनुमाओं की जगह लुट गई इस दौर में अहल-ए-क़लम की आबरू बिक रहे हैं अब सहाफ़ी बेसवाओं की जगह कुछ तो आता हम को भी जाँ से गुज़रने का मज़ा ग़ैर होते काश 'जालिब' आश्नाओं की जगह
Habib Jalib
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उस ने जब हँस के नमस्कार किया मुझ को इंसान से अवतार किया दश्त-ए-ग़ुर्बत में दिल-ए-वीराँ ने याद जमुना को कई बार किया प्यार की बात न पूछो यारो हम ने किस किस से नहीं प्यार किया कितनी ख़्वाबीदा तमन्नाओं को उस की आवाज़ ने बेदार किया हम पुजारी हैं बुतों के 'जालिब' हम ने का'बे में भी इक़रार किया
Habib Jalib
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फ़ैज़' और 'फ़ैज़' का ग़म भूलने वाला है कहीं मौत ये तेरा सितम भूलने वाला है कहीं हम से जिस वक़्त ने वो शाह-ए-सुख़न छीन लिया हम को वो वक़्त-ए-अलम भूलने वाला है कहीं तिरे अश्क और भी चमकाएँगी यादें उस की हम को वो दीदा-ए-नम भूलने वाला है कहीं कभी ज़िंदाँ में कभी दूर वतन से ऐ दोस्त जो किया उस ने रक़म भूलने वाला है कहीं आख़िरी बार उसे देख न पाए 'जालिब' ये मुक़द्दर का सितम भूलने वाला है कहीं
Habib Jalib
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ये सोच कर न माइल-ए-फ़रियाद हम हुए आबाद कब हुए थे कि बर्बाद हम हुए होता है शाद-काम यहाँ कौन बा-ज़मीर नाशाद हम हुए तो बहुत शाद हम हुए परवेज़ के जलाल से टकराए हम भी हैं ये और बात है कि न फ़रहाद हम हुए कुछ ऐसे भा गए हमें दुनिया के दर्द-ओ-ग़म कू-ए-बुताँ में भूली हुई याद हम हुए 'जालिब' तमाम उम्र हमें ये गुमाँ रहा उस ज़ुल्फ़ के ख़याल से आज़ाद हम हुए
Habib Jalib
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मीर'-ओ-'ग़ालिब' बने 'यगाना' बने आदमी ऐ ख़ुदा ख़ुदा न बने मौत की दस्तरस में कब से हैं ज़िंदगी का कोई बहाना बने अपना शायद यही था जुर्म ऐ दोस्त बा-वफ़ा बन के बे-वफ़ा न बने हम पे इक ए'तिराज़ ये भी है बे-नवा हो के बे-नवा न बने ये भी अपना क़ुसूर क्या कम है किसी क़ातिल के हम-नवा न बने क्या गिला संग-दिल ज़माने का आश्ना ही जब आश्ना न बने छोड़ कर उस गली को ऐ 'जालिब' इक हक़ीक़त से हम फ़साना बने
Habib Jalib
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