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aankh uthai hi thi ki khaai chot bach gai aankh dil pe aai chot dard-e-dil ki unhen khabar kya ho janta kaun hai parai chot aai tanha na khana-e-dil men dard ko apne saath laai chot teghh thi haath men na khanjar tha us ne kya jaane kya lagai chot yuun na qatil ko jab yaqin aaya ham ne dil khol kar dikhai chot aur kya karte ham bala-kash-e-ghham jo padi dil pe vo uthai chot kahin chhupti bhi hai lagi dil ki laakh 'fani' ne go chhupai chot aankh uthai hi thi ki khai chot bach gai aankh dil pe aai chot dard-e-dil ki unhen khabar kya ho jaanta kaun hai parai chot aai tanha na khana-e-dil mein dard ko apne sath lai chot tegh thi hath mein na khanjar tha us ne kya jaane kya lagai chot yun na qatil ko jab yaqin aaya hum ne dil khol kar dikhai chot aur kya karte hum bala-kash-e-gham jo padi dil pe wo uthai chot kahin chhupti bhi hai lagi dil ki lakh 'fani' ne go chhupai chot

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

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ख़ल्क़ कहती है जिसे दिल तिरे दीवाने का एक गोशा है ये दुनिया इसी वीराने का इक मुअ'म्मा है समझने का न समझाने का ज़िंदगी काहे को है ख़्वाब है दीवाने का हुस्न है ज़ात मिरी इश्क़ सिफ़त है मेरी हूँ तो मैं शम्अ' मगर भेस है परवाने का का'बे को दिल की ज़ियारत के लिए जाता हूँ आस्ताना है हरम मेरे सनम-ख़ाने का मुख़्तसर क़िस्सा-ए-ग़म ये है कि दिल रखता हूँ राज़-ए-कौनैन ख़ुलासा है इस अफ़्साने का ज़िंदगी भी तो पशेमाँ है यहाँ ला के मुझे ढूँडती है कोई हीला मिरे मर जाने का तुम ने देखा है कभी घर को बदलते हुए रंग आओ देखो न तमाशा मिरे ग़म-ख़ाने का अब इसे दार पे ले जा के सुला दे साक़ी यूँँ बहकना नहीं अच्छा तिरे मस्ताने का दिल से पहुँची तो हैं आँखों में लहू की बूँदें सिलसिला शीशे से मिलता तो है पैमाने का हड्डियाँ हैं कई लिपटी हुई ज़ंजीरों में लिए जाते हैं जनाज़ा तिरे दीवाने का वहदत-ए-हुस्न के जल्वों की ये कसरत ऐ इश्क़ दिल के हर ज़र्रे में आलम है परी-ख़ाने का चश्म-ए-साक़ी असर-ए-मय से नहीं है गुल-रंग दिल मिरे ख़ून से लबरेज़ है पैमाने का लौह दिल को ग़म-ए-उल्फ़त को क़लम कहते हैं कुन है अंदाज़-ए-रक़म हुस्न के अफ़्साने का हम ने छानी हैं बहुत दैर-ओ-हरम की गलियाँ कहीं पाया न ठिकाना तिरे दीवाने का किस की आँखें दम-ए-आख़िर मुझे याद आई हैं दिल मुरक़्क़ा' है छलकते हुए पैमाने का कहते हैं क्या ही मज़े का है फ़साना 'फ़ानी' आप की जान से दूर आप के मर जाने का हर नफ़स उम्र-ए-गुज़िश्ता की है मय्यत 'फ़ानी' ज़िंदगी नाम है मर मर के जिए जाने का

Fani Badayuni

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