ghazalKuch Alfaaz

ख़ल्क़ कहती है जिसे दिल तिरे दीवाने का एक गोशा है ये दुनिया इसी वीराने का इक मुअ'म्मा है समझने का न समझाने का ज़िंदगी काहे को है ख़्वाब है दीवाने का हुस्न है ज़ात मिरी इश्क़ सिफ़त है मेरी हूँ तो मैं शम्अ' मगर भेस है परवाने का का'बे को दिल की ज़ियारत के लिए जाता हूँ आस्ताना है हरम मेरे सनम-ख़ाने का मुख़्तसर क़िस्सा-ए-ग़म ये है कि दिल रखता हूँ राज़-ए-कौनैन ख़ुलासा है इस अफ़्साने का ज़िंदगी भी तो पशेमाँ है यहाँ ला के मुझे ढूँडती है कोई हीला मिरे मर जाने का तुम ने देखा है कभी घर को बदलते हुए रंग आओ देखो न तमाशा मिरे ग़म-ख़ाने का अब इसे दार पे ले जा के सुला दे साक़ी यूँँ बहकना नहीं अच्छा तिरे मस्ताने का दिल से पहुँची तो हैं आँखों में लहू की बूँदें सिलसिला शीशे से मिलता तो है पैमाने का हड्डियाँ हैं कई लिपटी हुई ज़ंजीरों में लिए जाते हैं जनाज़ा तिरे दीवाने का वहदत-ए-हुस्न के जल्वों की ये कसरत ऐ इश्क़ दिल के हर ज़र्रे में आलम है परी-ख़ाने का चश्म-ए-साक़ी असर-ए-मय से नहीं है गुल-रंग दिल मिरे ख़ून से लबरेज़ है पैमाने का लौह दिल को ग़म-ए-उल्फ़त को क़लम कहते हैं कुन है अंदाज़-ए-रक़म हुस्न के अफ़्साने का हम ने छानी हैं बहुत दैर-ओ-हरम की गलियाँ कहीं पाया न ठिकाना तिरे दीवाने का किस की आँखें दम-ए-आख़िर मुझे याद आई हैं दिल मुरक़्क़ा' है छलकते हुए पैमाने का कहते हैं क्या ही मज़े का है फ़साना 'फ़ानी' आप की जान से दूर आप के मर जाने का हर नफ़स उम्र-ए-गुज़िश्ता की है मय्यत 'फ़ानी' ज़िंदगी नाम है मर मर के जिए जाने का

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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मेरे लिए तो इश्क़ का वा'दा है शा'इरी आधा सुरूर तुम हो तो आधा है शा'इरी रुद्राक्ष हाथ में है तो सीने में ओम है कृष्णा है मेरा दिल मेरी राधा है शा'इरी अपना तो मेल जोल ही बस आशिकों से है दरवेश का बस एक लबादा है शा'इरी हो आश्ना कोई तो दिखाती है अपना रंग बे रम्ज़ियों के वास्ते सादा है शा'इरी तुम सामने हो और मेरी दस्तरस में हो इस वक़्त मेरे दिल का इरादा है शा'इरी भगवान हो ख़ुदा हो मुहब्बत हो या बदन जिस सम्त भी चलो यही जादा है शा'इरी इस लिए भी इश्क़ ही लिखता हूँ मैं अली मेरा किसी से आख़री वा'दा है शा'इरी

Ali Zaryoun

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