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aao koi tafrih ka saman kiya jaae phir se kisi vaaiz ko pareshan kiya jaae be-laghhzish-e-pa mast huun un ankhon se pi kar yuun mohtasib-e-shahr ko hairan kiya jaae har shai se muqaddas hai khayalat ka rishta kyuun maslahaton par use qurban kiya jaae muflis ke badan ko bhi hai chadar ki zarurat ab khul ke mazaron pe ye elaan kiya jaae vo shakhs jo divanon ki izzat nahin karta us shakhs ka bhi chaak gareban kiya jaae pahle bhi 'qatil' ankhon ne khaae kai dhoke ab aur na binai ka nuqsan kiya jaae aao koi tafrih ka saman kiya jae phir se kisi waiz ko pareshan kiya jae be-laghzish-e-pa mast hun un aankhon se pi kar yun mohtasib-e-shahr ko hairan kiya jae har shai se muqaddas hai khayalat ka rishta kyun maslahaton par use qurban kiya jae muflis ke badan ko bhi hai chadar ki zarurat ab khul ke mazaron pe ye elan kiya jae wo shakhs jo diwanon ki izzat nahin karta us shakhs ka bhi chaak gareban kiya jae pahle bhi 'qatil' aankhon ne khae kai dhoke ab aur na binai ka nuqsan kiya jae

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है

Umair Najmi

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खुला है झूट का बाज़ार आओ सच बोलें न हो बला से ख़रीदार आओ सच बोलें सुकूत छाया है इंसानियत की क़द्रों पर यही है मौक़ा-ए-इज़हार आओ सच बोलें हमें गवाह बनाया है वक़्त ने अपना ब-नाम-ए-अज़्मत-ए-किरदार आओ सच बोलें सुना है वक़्त का हाकिम बड़ा ही मुंसिफ़ है पुकार कर सर-ए-दरबार आओ सच बोलें तमाम शहर में क्या एक भी नहीं मंसूर कहेंगे क्या रसन-ओ-दार आओ सच बोलें बजा कि ख़ू-ए-वफ़ा एक भी हसीं में नहीं कहाँ के हम भी वफ़ादार आओ सच बोलें जो वस्फ़ हम में नहीं क्यूँँ करें किसी में तलाश अगर ज़मीर है बेदार आओ सच बोलें छुपाए से कहीं छुपते हैं दाग़ चेहरे के नज़र है आइना-बरदार आओ सच बोलें 'क़तील' जिन पे सदा पत्थरों को प्यार आया किधर गए वो गुनहगार आओ सच बोलें

Qateel Shifai

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अपने होंटों पर सजाना चाहता हूँ आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ कोई आँसू तेरे दामन पर गिरा कर बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ थक गया मैं करते करते याद तुझ को अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा रौशनी को, घर जलाना चाहता हूँ आख़िरी हिचकी तिरे ज़ानू पे आए मौत भी मैं शाइराना चाहता हूँ

Qateel Shifai

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तितलियों का रंग हो या झूमते बादल का रंग हम ने हर इक रंग को जाना तिरे आँचल का रंग तेरी आँखों की चमक है या सितारों की ज़िया रात का है घुप अँधेरा या तिरे काजल का रंग धड़कनों के ताल पर वो हाल अपने दिल का है जैसे गोरी के थिरकते पाँव में पायल का रंग फेंकना तुम सोच कर लफ़्ज़ों का ये कड़वा गुलाल फैल जाता है कभी सदियों पे भी इक पल का रंग आह ये रंगीन मौसम ख़ून की बरसात का छा रहा है अक़्ल पर जज़्बात की हलचल का रंग अब तो शबनम का हर इक मोती है कंकर की तरह हाँ उसी गुलशन पे छाया था कभी मख़मल का रंग फिर रहे हैं लोग हाथों में लिए ख़ंजर खुले कूचे कूचे में अब आता है नज़र मक़्तल का रंग चार जानिब जिस की रा'नाई के चर्चे हैं 'क़तील' जाने कब देखेंगे हम उस आने वाली कल का रंग

Qateel Shifai

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परेशां रात सारी है सितारो तुम तो सो जाओ सुकूत-ए-मर्ग तारी है सितारो तुम तो सो जाओ हंसो और हंसते-हंसते डूबते जाओ ख़लाओं में हमीं पे रात भारी है सितारो तुम तो सो जाओ हमें तो आज की शब पौ फटे तक जागना होगा यही क़िस्मत हमारी है सितारो तुम तो सो जाओ तुम्हें क्या आज भी कोई अगर मिलने नहीं आया ये बाज़ी हम ने हारी है सितारो तुम तो सो जाओ कहे जाते हो रो रो कर हमारा हाल दुनिया से ये कैसी राज़दारी है सितारो तुम तो सो जाओ हमें भी नींद आ जाएगी हम भी सो ही जाएँगे अभी कुछ बे-क़रारी है सितारो तुम तो सो जाओ

Qateel Shifai

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वो शख़्स कि मैं जिस से मोहब्बत नहीं करता हँसता है मुझे देख के नफ़रत नहीं करता पकड़ा ही गया हूँ तो मुझे दार पे खींचो सच्चा हूँ मगर अपनी वकालत नहीं करता क्यूँँ बख़्श दिया मुझ से गुनहगार को मौला मुंसिफ़ तो किसी से भी रिआ'यत नहीं करता घर वालों को ग़फ़लत पे सभी कोस रहे हैं चोरों को मगर कोई मलामत नहीं करता किस क़ौम के दिल में नहीं जज़्बात-ए-बराहीम किस मुल्क पे नमरूद हुकूमत नहीं करता देते हैं उजाले मिरे सज्दों की गवाही मैं छुप के अँधेरे में इबादत नहीं करता भूला नहीं मैं आज भी आदाब-ए-जवानी मैं आज भी औरों को नसीहत नहीं करता इंसान ये समझें कि यहाँ दफ़्न ख़ुदा है मैं ऐसे मज़ारों की ज़ियारत नहीं करता दुनिया में 'क़तील' उस सा मुनाफ़िक़ नहीं कोई जो ज़ुल्म तो सहता है बग़ावत नहीं करता

Qateel Shifai

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