ghazalKuch Alfaaz

आसमाँ पर काले बादल छा गए घर के अंदर आइने धुँदला गए क्या ग़ज़ब है एक भी कोयल नहीं सब बग़ीचे आम के मंजरा गए घटते बढ़ते फ़ासलों के दरमियाँ दफ़्अ'तन दो रास्ते बल खा गए डूबता है आ के सूरज उन के पास वो दरीचे मेरे दिल को भा गए शहर क्या दुनिया बदल कर देख लो फिर कहोगे हम तो अब उकता गए सामने था बे-रुख़ी का आसमाँ इस लिए वापस ज़मीं पर आ गए याद आया कुछ गिरा था टूट कर बे-ख़ुदी में ख़ुद से कल टकरा गए हुर्मत-ए-लौह-ओ-क़लम जाती रही किस तरह के लोग अदब में आ गए हम हैं मुजरिम आप मुल्ज़िम भी नहीं आप किस अंजाम से घबरा गए हो गई है शो'ला-ज़न हर शाख़-ए-गुल बढ़ रहे थे हाथ जो थर्रा गए धँस गए जो रुक गए थे राह में देखते थे मुड़ के जो पथरा गए घर की तन्हाई जब आँगन हो गई ये सितारे क्या क़यामत ढा गए थे मुख़ातब जिस्म लहजे बे-शुमार जाँ-बलब अरमाँ 'ख़लिश' ग़ज़ला गए

Related Ghazal

किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

95 likes

महीनों बा'द दफ्तर आ रहे हैं हम एक सद में से बाहर आ रहे हैं तेरी बाहों से दिल उकता गया हैं अब इस झूले में चक्कर आ रहे हैं कहाँ सोया है चौकीदार मेरा ये कैसे लोग अंदर आ रहे हैं समुंदर कर चुका तस्लीम हम को खजाने ख़ुद ही ऊपर आ रहे हैं यही एक दिन बचा था देखने को उसे बस में बिठा कर आ रहे हैं

Tehzeeb Hafi

116 likes

कोई दम भी मैं कब अंदर रहा हूँ लिए हैं साँस और बाहर रहा हूँ धुएँ में साँस हैं साँसों में पल हैं मैं रौशन-दान तक बस मर रहा हूँ फ़ना हर दम मुझे गिनती रही है मैं इक दम का था और दिन भर रहा हूँ ज़रा इक साँस रोका तो लगा यूँँ कि इतनी देर अपने घर रहा हूँ ब-जुज़ अपने मुयस्सर है मुझे क्या सो ख़ुद से अपनी जेबें भर रहा हूँ हमेशा ज़ख़्म पहुँचे हैं मुझी को हमेशा मैं पस-ए-लश्कर रहा हूँ लिटा दे नींद के बिस्तर पे ऐ रात मैं दिन भर अपनी पलकों पर रहा हूँ

Jaun Elia

19 likes

मैं आसमाँ पे बहुत देर रह नहीं सकता मगर ये बात ज़मीं से तो कह नहीं सकता किसी के चेहरे को कब तक निगाह में रक्खूँ सफ़र में एक ही मंज़र तो रह नहीं सकता ये आज़माने की फ़ुर्सत तुझे कभी मिल जाए मैं आँखों आँखों में क्या बात कह नहीं सकता सहारा लेना ही पड़ता है मुझ को दरिया का मैं एक क़तरा हूँ तन्हा तो बह नहीं सकता लगा के देख ले जो भी हिसाब आता हो मुझे घटा के वो गिनती में रह नहीं सकता ये चंद लम्हों की बे-इख़्तियारियाँ हैं 'वसीम' गुनह से रिश्ता बहुत देर रह नहीं सकता

Waseem Barelvi

19 likes

ग़लत निकले सब अंदाज़े हमारे कि दिन आए नहीं अच्छे हमारे सफ़र से बाज़ रहने को कहा हैं किसी ने खोल के तस्में हमारे हर इक मौसम बहुत अंदर तक आया खुले रहते थे दरवाज़े हमारे उस अब्र-ए-मेहरबाँ से क्या शिकायत अगर बर्तन नहीं भरते हमारे

Tehzeeb Hafi

60 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Badr-e-Alam Khalish.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Badr-e-Alam Khalish's ghazal.