आसमाँ पर काले बादल छा गए घर के अंदर आइने धुँदला गए क्या ग़ज़ब है एक भी कोयल नहीं सब बग़ीचे आम के मंजरा गए घटते बढ़ते फ़ासलों के दरमियाँ दफ़्अ'तन दो रास्ते बल खा गए डूबता है आ के सूरज उन के पास वो दरीचे मेरे दिल को भा गए शहर क्या दुनिया बदल कर देख लो फिर कहोगे हम तो अब उकता गए सामने था बे-रुख़ी का आसमाँ इस लिए वापस ज़मीं पर आ गए याद आया कुछ गिरा था टूट कर बे-ख़ुदी में ख़ुद से कल टकरा गए हुर्मत-ए-लौह-ओ-क़लम जाती रही किस तरह के लोग अदब में आ गए हम हैं मुजरिम आप मुल्ज़िम भी नहीं आप किस अंजाम से घबरा गए हो गई है शो'ला-ज़न हर शाख़-ए-गुल बढ़ रहे थे हाथ जो थर्रा गए धँस गए जो रुक गए थे राह में देखते थे मुड़ के जो पथरा गए घर की तन्हाई जब आँगन हो गई ये सितारे क्या क़यामत ढा गए थे मुख़ातब जिस्म लहजे बे-शुमार जाँ-बलब अरमाँ 'ख़लिश' ग़ज़ला गए
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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
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महीनों बा'द दफ्तर आ रहे हैं हम एक सद में से बाहर आ रहे हैं तेरी बाहों से दिल उकता गया हैं अब इस झूले में चक्कर आ रहे हैं कहाँ सोया है चौकीदार मेरा ये कैसे लोग अंदर आ रहे हैं समुंदर कर चुका तस्लीम हम को खजाने ख़ुद ही ऊपर आ रहे हैं यही एक दिन बचा था देखने को उसे बस में बिठा कर आ रहे हैं
Tehzeeb Hafi
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कोई दम भी मैं कब अंदर रहा हूँ लिए हैं साँस और बाहर रहा हूँ धुएँ में साँस हैं साँसों में पल हैं मैं रौशन-दान तक बस मर रहा हूँ फ़ना हर दम मुझे गिनती रही है मैं इक दम का था और दिन भर रहा हूँ ज़रा इक साँस रोका तो लगा यूँँ कि इतनी देर अपने घर रहा हूँ ब-जुज़ अपने मुयस्सर है मुझे क्या सो ख़ुद से अपनी जेबें भर रहा हूँ हमेशा ज़ख़्म पहुँचे हैं मुझी को हमेशा मैं पस-ए-लश्कर रहा हूँ लिटा दे नींद के बिस्तर पे ऐ रात मैं दिन भर अपनी पलकों पर रहा हूँ
Jaun Elia
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मैं आसमाँ पे बहुत देर रह नहीं सकता मगर ये बात ज़मीं से तो कह नहीं सकता किसी के चेहरे को कब तक निगाह में रक्खूँ सफ़र में एक ही मंज़र तो रह नहीं सकता ये आज़माने की फ़ुर्सत तुझे कभी मिल जाए मैं आँखों आँखों में क्या बात कह नहीं सकता सहारा लेना ही पड़ता है मुझ को दरिया का मैं एक क़तरा हूँ तन्हा तो बह नहीं सकता लगा के देख ले जो भी हिसाब आता हो मुझे घटा के वो गिनती में रह नहीं सकता ये चंद लम्हों की बे-इख़्तियारियाँ हैं 'वसीम' गुनह से रिश्ता बहुत देर रह नहीं सकता
Waseem Barelvi
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ग़लत निकले सब अंदाज़े हमारे कि दिन आए नहीं अच्छे हमारे सफ़र से बाज़ रहने को कहा हैं किसी ने खोल के तस्में हमारे हर इक मौसम बहुत अंदर तक आया खुले रहते थे दरवाज़े हमारे उस अब्र-ए-मेहरबाँ से क्या शिकायत अगर बर्तन नहीं भरते हमारे
Tehzeeb Hafi
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