ghazalKuch Alfaaz

ab ke ham bichhde to shayad kabhi khvabon men milen jis tarah sukhe hue phuul kitabon men milen should we now be parted, in dreams we might be found like dried flowers found in books, fragile, fraying browned dhundh ujde hue logon men vafa ke moti ye khazane tujhe mumkin hai kharabon men milen seek ye pearls of faithfulness in those lost and drowned it well could be these treasures in wastelands do abound ghham-e-duniya bhi ghham-e-yar men shamil kar lo nashsha badhta hai sharaben jo sharabon men milen let love's longing with the ache of existence compound when spirits intermingle the euphoria is profound tu khuda hai na mira ishq farishton jaisa donon insan hain to kyuun itne hijabon men milen neither are not god nor is my love divine, profound if human both then why does this secrecy surround aaj ham daar pe khinche gae jin baton par kya ajab kal vo zamane ko nisabon men milen the acts for which today i've been crucified around if prescribed tomorrow, then why should it astound ab na vo main na vo tu hai na vo maazi hai 'faraz' jaise do shakhs tamanna ke sarabon men milen i am not the same, nor you, our past's no more around like two shadows in the mists of longing to be found ab ke hum bichhde to shayad kabhi khwabon mein milen jis tarah sukhe hue phul kitabon mein milen should we now be parted, in dreams we might be found like dried flowers found in books, fragile, fraying browned dhundh ujde hue logon mein wafa ke moti ye khazane tujhe mumkin hai kharabon mein milen seek ye pearls of faithfulness in those lost and drowned it well could be these treasures in wastelands do abound gham-e-duniya bhi gham-e-yar mein shamil kar lo nashsha badhta hai sharaben jo sharabon mein milen let love's longing with the ache of existence compound when spirits intermingle the euphoria is profound tu khuda hai na mera ishq farishton jaisa donon insan hain to kyun itne hijabon mein milen neither are not god nor is my love divine, profound if human both then why does this secrecy surround aaj hum dar pe khinche gae jin baaton par kya ajab kal wo zamane ko nisabon mein milen the acts for which today i've been crucified around if prescribed tomorrow, then why should it astound ab na wo main na wo tu hai na wo mazi hai 'faraaz' jaise do shakhs tamanna ke sarabon mein milen i am not the same, nor you, our past's no more around like two shadows in the mists of longing to be found

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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वहशतें बढ़ती गईं हिज्र के आज़ार के साथ अब तो हम बात भी करते नहीं ग़म-ख़्वार के साथ हम ने इक उम्र बसर की है ग़म-ए-यार के साथ 'मीर' दो दिन न जिए हिज्र के आज़ार के साथ अब तो हम घर से निकलते हैं तो रख देते हैं ताक़ पर इज़्ज़त-ए-सादात भी दस्तार के साथ इस क़दर ख़ौफ़ है अब शहर की गलियों में कि लोग चाप सुनते हैं तो लग जाते हैं दीवार के साथ एक तो ख़्वाब लिए फिरते हो गलियों गलियों उस पे तकरार भी करते हो ख़रीदार के साथ शहर का शहर ही नासेह हो तो क्या कीजिएगा वर्ना हम रिंद तो भिड़ जाते हैं दो-चार के साथ हम को उस शहर में ता'मीर का सौदा है जहाँ लोग में'मार को चुन देते हैं दीवार के साथ जो शरफ़ हम को मिला कूचा-ए-जानाँ से 'फ़राज़' सू-ए-मक़्तल भी गए हैं उसी पिंदार के साथ

Ahmad Faraz

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क्यूँँ तबीअत कहीं ठहरती नहीं दोस्ती तो उदास करती नहीं हम हमेशा के सैर-चश्म सही तुझ को देखें तो आँख भरती नहीं शब-ए-हिज्राँ भी रोज़-ए-बद की तरह कट तो जाती है पर गुज़रती नहीं ये मोहब्बत है, सुन, ज़माने, सुन! इतनी आसानियों से मरती नहीं जिस तरह तुम गुजारते हो फ़राज़ ज़िन्दगी उस तरह गुज़रती नहीं

Ahmad Faraz

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जो ग़ैर थे वो इसी बात पर हमारे हुए कि हम से दोस्त बहुत बे-ख़बर हमारे हुए किसे ख़बर वो मोहब्बत थी या रक़ाबत थी बहुत से लोग तुझे देख कर हमारे हुए अब इक हुजूम-ए-शिकस्ता-दिलाँ है साथ अपने जिन्हें कोई न मिला हम-सफ़र हमारे हुए किसी ने ग़म तो किसी ने मिज़ाज-ए-ग़म बख़्शा सब अपनी अपनी जगह चारा-गर हमारे हुए बुझा के ताक़ की शमएँ न देख तारों को इसी जुनूँ में तो बर्बाद घर हमारे हुए वो ए'तिमाद कहाँ से 'फ़राज़' लाएँगे किसी को छोड़ के वो अब अगर हमारे हुए

Ahmad Faraz

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उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ अब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ हम ख़ुल्द से निकल तो गए हैं पर ऐ ख़ुदा इतने से वाक़िए का फ़साना बहुत हुआ अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी उस से ज़रा सा रब्त बढ़ाना बहुत हुआ अब क्यूँँंन ज़िंदगी पे मोहब्बत को वार दें इस आशिक़ी में जान से जाना बहुत हुआ अब तक तो दिल का दिल से तआ'रुफ़ न हो सका माना कि उस से मिलना मिलाना बहुत हुआ क्या क्या न हम ख़राब हुए हैं मगर ये दिल ऐ याद-ए-यार तेरा ठिकाना बहुत हुआ कहता था नासेहों से मिरे मुँह न आइयो फिर क्या था एक हूँ का बहाना बहुत हुआ लो फिर तिरे लबों पे उसी बे-वफ़ा का ज़िक्र अहमद-'फ़राज़' तुझ से कहा न बहुत हुआ

Ahmad Faraz

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यूँँही मर मर के जिएँ वक़्त गुज़ारे जाएँ ज़िंदगी हम तिरे हाथों से न मारे जाएँ अब ज़मीं पर कोई गौतम न मोहम्मद न मसीह आसमानों से नए लोग उतारे जाएँ वो जो मौजूद नहीं उस की मदद चाहते हैं वो जो सुनता ही नहीं उस को पुकारे जाएँ बाप लर्ज़ां है कि पहुँची नहीं बारात अब तक और हम-जोलियाँ दुल्हन को सँवारे जाएँ हम कि नादान जुआरी हैं सभी जानते हैं दिल की बाज़ी हो तो जी जान से हारे जाएँ तज दिया तुम ने दर-ए-यार भी उकता के 'फ़राज़' अब कहाँ ढूँढ़ने ग़म-ख़्वार तुम्हारे जाएँ

Ahmad Faraz

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