ghazalKuch Alfaaz

ऐ ज़िंदगी ये क्या हुआ तू ही बता थोड़ा-बहुत वो भी नाराज़ है मैं भी ख़फ़ा थोड़ा-बहुत मंज़िल हमारी क्या हुई ये किस जहाँ में आ गए अब सोचना पेशा हुआ कहना रहा थोड़ा-बहुत ना-मेहरबां हर रास्ता और बे-वफ़ा इक-इक गली हम खो गए इस शहर में रस्ता मिला थोड़ा-बहुत ये लुत्फ़ मुझ पर किसलिए एहसान का क्या फ़ाइदा अब वक़्त सारा कट चुका, अच्छा-बुरा, थोड़ा-बहुत उस बज़्म से बावस्तगी क्या-क्या दिखाएगी नबील फिर आ गए तुम हार कर जो कुछ भी था थोड़ा-बहुत

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

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ये किस मक़ाम पे लाया गया ख़ुदाया मुझे कि आज रौंद के गुज़रा है मेरा साया मुझे मैं जैसे वक़्त के हाथों में इक ख़ज़ाना था किसी ने खो दिया मुझ को किसी ने पाया मुझे न जाने कौन हूँ किस लम्हा-ए-तलब में हूँ 'नबील' चैन से जीना कभी न आया मुझे मैं एक लम्हा था और नींद के हिसार में था फिर एक रोज़ किसी ख़्वाब ने जगाया मुझे उसी ज़मीं ने सितारा किया है मेरा वजूद समझ रहे हैं ज़मीं वाले क्यूँँ पराया मुझे जहाँ कि सदियों की ख़ामोशियाँ सुलगती हैं किसी ख़याल की वहशत ने गुनगुनाया मुझे इक आरज़ू के तआक़ुब में यूँँ हुआ है 'नबील' हवा ने रेत की पलकों पे ला बिठाया मुझे

Aziz Nabeel

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वो दुख नसीब हुए ख़ुद-कफ़ील होने में कि उम्र कट गई ख़ुद की दलील होने में मुसाफ़िरों के क़दम डगमगाए जाते थे अजब नशा था सफ़र के तवील होने में वो एक संग जो रस्ते में ईस्तादा था उसे ज़माने लगे संग-ए-मील होने में मुनाफ़िक़ीन से ख़तरा कभी ग़नीम का ख़ौफ़ क़यामतें हैं बहुत बे-फ़सील होने में अज़ीज़ होने में आसानियाँ बहुत सी थीं बहुत से दर्द मिले हैं 'नबील' होने में

Aziz Nabeel

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दश्त-ओ-सहरा में समुंदर में सफ़र है मेरा रंग फैला हुआ ता-हद्द-ए-नज़र है मेरा नहीं मालूम, उसे उस की ख़बर है कि नहीं वो किसी और का चेहरा है, मगर है मेरा तू ने इस बार तो बस मार ही डाला था मुझे मैं हूँ ज़िंदा तो मिरी जान हुनर है मेरा आज तक अपनी ही तरदीद किए जाता हूँ आज तक मेरे ख़द-ओ-ख़ाल में डर है मेरा बाग़बाँ ऐसा कि मिट्टी में मिला बैठा हूँ शाख़-दर-शाख़ दरख़्तों पे असर है मेरा शाएरी, इश्क़, ग़म-ए-रिज़्क़, किताबें, घर-बार कई सम्तों में ब-यक-वक़्त गुज़र है मेरा

Aziz Nabeel

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