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वो दुख नसीब हुए ख़ुद-कफ़ील होने में कि उम्र कट गई ख़ुद की दलील होने में मुसाफ़िरों के क़दम डगमगाए जाते थे अजब नशा था सफ़र के तवील होने में वो एक संग जो रस्ते में ईस्तादा था उसे ज़माने लगे संग-ए-मील होने में मुनाफ़िक़ीन से ख़तरा कभी ग़नीम का ख़ौफ़ क़यामतें हैं बहुत बे-फ़सील होने में अज़ीज़ होने में आसानियाँ बहुत सी थीं बहुत से दर्द मिले हैं 'नबील' होने में

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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ये किस मक़ाम पे लाया गया ख़ुदाया मुझे कि आज रौंद के गुज़रा है मेरा साया मुझे मैं जैसे वक़्त के हाथों में इक ख़ज़ाना था किसी ने खो दिया मुझ को किसी ने पाया मुझे न जाने कौन हूँ किस लम्हा-ए-तलब में हूँ 'नबील' चैन से जीना कभी न आया मुझे मैं एक लम्हा था और नींद के हिसार में था फिर एक रोज़ किसी ख़्वाब ने जगाया मुझे उसी ज़मीं ने सितारा किया है मेरा वजूद समझ रहे हैं ज़मीं वाले क्यूँँ पराया मुझे जहाँ कि सदियों की ख़ामोशियाँ सुलगती हैं किसी ख़याल की वहशत ने गुनगुनाया मुझे इक आरज़ू के तआक़ुब में यूँँ हुआ है 'नबील' हवा ने रेत की पलकों पे ला बिठाया मुझे

Aziz Nabeel

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ऐ ज़िंदगी ये क्या हुआ तू ही बता थोड़ा-बहुत वो भी नाराज़ है मैं भी ख़फ़ा थोड़ा-बहुत मंज़िल हमारी क्या हुई ये किस जहाँ में आ गए अब सोचना पेशा हुआ कहना रहा थोड़ा-बहुत ना-मेहरबां हर रास्ता और बे-वफ़ा इक-इक गली हम खो गए इस शहर में रस्ता मिला थोड़ा-बहुत ये लुत्फ़ मुझ पर किसलिए एहसान का क्या फ़ाइदा अब वक़्त सारा कट चुका, अच्छा-बुरा, थोड़ा-बहुत उस बज़्म से बावस्तगी क्या-क्या दिखाएगी नबील फिर आ गए तुम हार कर जो कुछ भी था थोड़ा-बहुत

Aziz Nabeel

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दश्त-ओ-सहरा में समुंदर में सफ़र है मेरा रंग फैला हुआ ता-हद्द-ए-नज़र है मेरा नहीं मालूम, उसे उस की ख़बर है कि नहीं वो किसी और का चेहरा है, मगर है मेरा तू ने इस बार तो बस मार ही डाला था मुझे मैं हूँ ज़िंदा तो मिरी जान हुनर है मेरा आज तक अपनी ही तरदीद किए जाता हूँ आज तक मेरे ख़द-ओ-ख़ाल में डर है मेरा बाग़बाँ ऐसा कि मिट्टी में मिला बैठा हूँ शाख़-दर-शाख़ दरख़्तों पे असर है मेरा शाएरी, इश्क़, ग़म-ए-रिज़्क़, किताबें, घर-बार कई सम्तों में ब-यक-वक़्त गुज़र है मेरा

Aziz Nabeel

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