ऐ गुल-ए-नौ-दमीदा के मानिंद है तू किस आफ़रीदा के मानिंद हम उम्मीद-ए-वफ़ा पे तेरी हुए गुंचा-ए-दैर चीदा के मानिंद ख़ाक को मेरी सैर कर के फिरा वो ग़ज़ाल-ए-रमीदा के मानिंद सर उठाते ही हो गए पामाल सब्ज़ा-ए-नौ-दमीदा के मानिंद न कटे रात हिज्र की जो न हो नाला तेग़-ए-कशीदा के मानिंद हम गिरफ़्तार-ए-हाल हैं अपने ताइर-ए-पर-बुरीदा के मानिंद दिल तड़पता है अश्क-ए-ख़ूनीं में सैद-ए-दर-ख़ूँ तपीदा के मानिंद तुझ से यूसुफ़ को क्यूँँके निस्बत दें कब शुनीदा हो दीदा के मानिंद 'मीर'-साहिब भी उस के हाँ थे लेक बंदा-ए-ज़र ख़रीदा के मानिंद
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है हाँ अगर मुझ सेे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा
Tehzeeb Hafi
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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो
Fazil Jamili
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वो एक पक्षी जो गुंजन कर रहा है वो मुझ में प्रेम सृजन कर रहा है बहुत दिन हो गए है तुम सेे बिछड़े तुम्हें मिलने को अब मन कर रहा है नदी के शांत तट पर बैठ कर मन तेरी यादें विसर्जन कर रहा है
Azhar Iqbal
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ख़राबी कुछ न पूछो मुलकत-ए-दिल की इमारत की ग़मों ने आज-कल सुनियो वो आबादी ही ग़ारत की निगाह-ए-मस्त से जब चश्म ने इस की इशारत की हलावत मय की और बुनियाद मयख़ाने की ग़ारत की सहर-गह मैं ने पूछा गुल से हाल-ए-ज़ार बुलबुल का पड़े थे बाग़ में यक-मुशत पर ऊधर इशारत की जलाया जिस तजल्ली-ए-जल्वा-गर ने तूर को हम-दम उसी आतिश के पर काले ने हम से भी शरारत की नज़ाकत क्या कहूँ ख़ुर्शीद-रू की कल शब-ए-मह में गया था साए साए बाग़ तक तिस पर हरारत की नज़र से जिस की यूसुफ़ सा गया फिर उस को क्या सूझे हक़ीक़त कुछ न पूछो पीर-ए-कनआँ' की बसारत की तिरे कूचे के शौक़-ए-तौफ़ में जैसे बगूला था बयाबाँ मैं ग़ुबार 'मीर' की हम ने ज़ियारत की
Meer Taqi Meer
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महर की तुझ से तवक़्क़ो' थी सितमगर निकला मोम समझे थे तिरे दिल को सो पत्थर निकला दाग़ हूँ रश्क-ए-मोहब्बत से कि इतना बेताब किस की तस्कीं के लिए घर से तू बाहर निकला जीते जी आह तिरे कूचे से कोई न फिरा जो सितम-दीदा रहा जा के सो मर कर निकला दिल की आबादी की इस हद है ख़राबी कि न पूछ जाना जाता है कि उस राह से लश्कर निकला अश्क-ए-तर क़तरा-ए-ख़ूँ लख़्त-ए-जिगर पारा-ए-दिल एक से एक अदद आँख से बह कर निकला कुंज-कावी जो की सीने की ग़म-ए-हिज्राँ ने इस दफ़ीने में से अक़साम-ए-जवाहर निकला हम ने जाना था लिखेगा तू कोई हर्फ़ ऐ 'मीर' पर तिरा नामा तो इक शौक़ का दफ़्तर निकला
Meer Taqi Meer
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मुस्तूजिब-ए-ज़ुलम-ओ-सितम-ओ-जौर-ओ-जफ़ा हूँ हर-चंद कि जलता हूँ पे सरगर्म-ए-वफ़ा हूँ आते हैं मुझे ख़ूब से दोनों हुनर-ए-इश्क़ रोने के तईं आँधी हूँ कुढ़ने को बला हूँ इस गुलशन-ए-दुनिया में शगुफ़्ता न हुआ मैं हूँ ग़ुंचा-ए-अफ़्सुर्दा कि मर्दूद-ए-सबा हूँ हम-चश्म है हर आबला-ए-पा का मिरा अश्क अज़-बस कि तिरी राह में आँखों से चला हूँ आया कोई भी तरह मिरे चीन की होगी आज़ुर्दा हूँ जीने से मैं मरने से ख़फ़ा हूँ दामन न झटक हाथ से मेरे कि सितमगर हूँ ख़ाक-ए-सर-ए-राह कोई दम में हुआ हूँ दिल ख़्वाह जला अब तो मुझे ऐ शब-ए-हिज्राँ मैं सोख़्ता भी मुंतज़िर-ए-रोज़-ए-जज़ा हूँ गो ताक़त-ओ-आराम-ओ-ख़ोर-ओ-ख़्वाब गए सब बारे ये ग़नीमत है कि जीता तो रहा हूँ इतना ही मुझे इल्म है कुछ मैं हूँ बहर-चीज़ मा'लूम नहीं ख़ूब मुझे भी कि मैं क्या हूँ बेहतर है ग़रज़ ख़ामुशी ही कहने से याराँ मत पूछो कुछ अहवाल कि मर मर के जिया हूँ तब गर्म-ए-सुख़न कहने लगा हूँ मैं कि इक उम्र जूँ शम्अ'' सर-ए-शाम से ता-सुब्ह जला हूँ सीना तो किया फ़ज़्ल-ए-इलाही से सभी चाक है वक़्त-ए-दुआ 'मीर' कि अब दिल को लगा हूँ
Meer Taqi Meer
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तंग आए हैं दिल उस जी से उठा बैठेंगे भूखों मरते हैं कुछ अब यार भी खा बैठेंगे अब के बिगड़ेगी अगर उन से तो इस शहर से जा कसो वीराने में तकिया ही बना बैठेंगे मा'रका गर्म तो टक होने दो ख़ूँ-रेज़ी का पहले तलवार के नीचे हमीं जा बैठेंगे होगा ऐसा भी कोई रोज़ कि मज्लिस से कभू हम तो एक-आध घड़ी उठ के जुदा बैठेंगे जा न इज़हार-ए-मोहब्बत पे हवसनाकों की वक़्त के वक़्त ये सब मुँह को छुपा बैठेंगे देखें वो ग़ैरत-ए-ख़ुर्शीद कहाँ जाता है अब सर-ए-राह दम-ए-सुब्ह से आ बैठेंगे भीड़ टलती ही नहीं आगे से उस ज़ालिम के गर्दनें यार किसी रोज़ कटा बैठेंगे कब तलक गलियों में सौदाई से फिरते रहिए दिल को उस ज़ुल्फ़-ए-मुसलसल से लगा बैठेंगे शोला-अफ़्शाँ अगर ऐसी ही रही आह तो 'मीर' घर को हम अपने कसो रात जला बैठेंगे
Meer Taqi Meer
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अब 'मीर'-जी तो अच्छे ज़िंदीक़ ही बन बैठे पेशानी पे दे क़श्क़ा ज़ुन्नार पहन बैठे आज़ुर्दा दिल-ए-उलफ़त हम चुपके ही बेहतर हैं सब रो उठेगी मज्लिस जो कर के सुख़न बैठे उर्यान फिरें कब तक ऐ काश कहीं आ कर ता गर्द बयाबाँ की बाला-ए-बदन बैठे पैकान-ए-ख़दंग उस का यूँँ सीने के ऊधर है जों मार-ए-सियह कोई काढ़े हुए फन बैठे जुज़ ख़त के ख़याल उस के कुछ काम नहीं हम को सब्ज़ी पिए हम अक्सर रहते हैं मगन बैठे शमशीर-ए-सितम उस की अब गो का चले हर-दम शोरीदा-सर अपने से हम बाँध कफ़न बैठे बस हो तो इधर-ऊधर यूँँ फिरने न दें तुझ को नाचार तिरे हम ये देखें हैं चलन बैठे
Meer Taqi Meer
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