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महर की तुझ से तवक़्क़ो' थी सितमगर निकला मोम समझे थे तिरे दिल को सो पत्थर निकला दाग़ हूँ रश्क-ए-मोहब्बत से कि इतना बेताब किस की तस्कीं के लिए घर से तू बाहर निकला जीते जी आह तिरे कूचे से कोई न फिरा जो सितम-दीदा रहा जा के सो मर कर निकला दिल की आबादी की इस हद है ख़राबी कि न पूछ जाना जाता है कि उस राह से लश्कर निकला अश्क-ए-तर क़तरा-ए-ख़ूँ लख़्त-ए-जिगर पारा-ए-दिल एक से एक अदद आँख से बह कर निकला कुंज-कावी जो की सीने की ग़म-ए-हिज्राँ ने इस दफ़ीने में से अक़साम-ए-जवाहर निकला हम ने जाना था लिखेगा तू कोई हर्फ़ ऐ 'मीर' पर तिरा नामा तो इक शौक़ का दफ़्तर निकला

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है

Jaun Elia

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तेरा चुप रहना मेरे ज़ेहन में क्या बैठ गया इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया यूँँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया इतना मीठा था वो ग़ुस्से भरा लहजा मत पूछ उस ने जिस को भी जाने का कहा, बैठ गया अपना लड़ना भी मोहब्बत है तुम्हें इल्म नहीं चीख़ती तुम रही और मेरा गला बैठ गया उस की मर्ज़ी वो जिसे पास बिठा ले अपने इस पे क्या लड़ना फुलाँ मेरी जगह बैठ गया बात दरियाओं की, सूरज की, न तेरी है यहाँ दो क़दम जो भी मेरे साथ चला बैठ गया बज़्म-ए-जानाँ में नशिस्तें नहीं होतीं मख़्सूस जो भी इक बार जहाँ बैठ गया बैठ गया

Tehzeeb Hafi

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आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा बे-वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं तुम ने मिरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा यारों की मोहब्बत का यक़ीं कर लिया मैं ने फूलों में छुपाया हुआ ख़ंजर नहीं देखा महबूब का घर हो कि बुज़ुर्गों की ज़मीनें जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़ कर नहीं देखा ख़त ऐसा लिखा है कि नगीने से जड़े हैं वो हाथ कि जिस ने कोई ज़ेवर नहीं देखा पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा

Bashir Badr

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गले तो लगना है उस सेे कहो अभी लग जाए यही न हो मेरा उस के बग़ैर जी लग जाए मैं आ रहा हूँ तेरे पास ये न हो कि कहीं तेरा मज़ाक़ हो और मेरी ज़िंदगी लग जाए अगर कोई तेरी रफ़्तार मापने निकले दिमाग़ क्या है जहानों की रौशनी लग जाए तू हाथ उठा नहीं सकता तो मेरा हाथ पकड़ तुझे दुआ नहीं लगती तो शा'इरी लग जाए पता करूँँगा अँधेरे में किस से मिलता है और इस अमल में मुझे चाहे आग भी लग जाए हमारे हाथ ही जलते रहेंगे सिगरेट से? कभी तुम्हारे भी कपड़ों पे इस्त्री लग जाए हर एक बात का मतलब निकालने वालों तुम्हारे नाम के आगे न मतलबी लग जाए क्लासरूम हो या हश्र कैसे मुमकिन है हमारे होते तेरी ग़ैर-हाज़िरी लग जाए मैं पिछले बीस बरस से तेरी गिरफ़्त में हूँ के इतने देर में तो कोई आई. जी. लग जाए

Tehzeeb Hafi

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ख़राबी कुछ न पूछो मुलकत-ए-दिल की इमारत की ग़मों ने आज-कल सुनियो वो आबादी ही ग़ारत की निगाह-ए-मस्त से जब चश्म ने इस की इशारत की हलावत मय की और बुनियाद मयख़ाने की ग़ारत की सहर-गह मैं ने पूछा गुल से हाल-ए-ज़ार बुलबुल का पड़े थे बाग़ में यक-मुशत पर ऊधर इशारत की जलाया जिस तजल्ली-ए-जल्वा-गर ने तूर को हम-दम उसी आतिश के पर काले ने हम से भी शरारत की नज़ाकत क्या कहूँ ख़ुर्शीद-रू की कल शब-ए-मह में गया था साए साए बाग़ तक तिस पर हरारत की नज़र से जिस की यूसुफ़ सा गया फिर उस को क्या सूझे हक़ीक़त कुछ न पूछो पीर-ए-कनआँ' की बसारत की तिरे कूचे के शौक़-ए-तौफ़ में जैसे बगूला था बयाबाँ मैं ग़ुबार 'मीर' की हम ने ज़ियारत की

Meer Taqi Meer

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शब था नालाँ अज़ीज़ कोई था मुर्ग़-ए-ख़ुश-ख़्वाँ अज़ीज़ कोई था थी तुम्हारे सितम की ताब उस तक सब्र जो याँ अज़ीज़ कोई था शब को उस का ख़याल था दिल में घर में मेहमाँ अज़ीज़ कोई था चाह बेजा न थी ज़ुलेख़ा की माह-ए-कनआँ अज़ीज़ कोई था अब तो उस की गली में ख़ार है लेक 'मीर' बे-जाँ अज़ीज़ कोई था

Meer Taqi Meer

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क्या कहें अपनी उस की शब की बात कहिए होवे जो कुछ भी ढब की बात अब तो चुप लग गई है हैरत से फिर खुलेगी ज़बान जब की बात नुक्ता-दानान-ए-रफ़्ता की न कहो बात वो है जो होवे अब की बात किस का रू-ए-सुख़न नहीं है उधर है नज़र में हमारी सब की बात ज़ुल्म है क़हर है क़यामत है ग़ुस्से में उस के ज़ेर-ए-लब की बात कहते हैं आगे था बुतों में रहम है ख़ुदा जानिए ये कब की बात गो कि आतिश-ज़बाँ थे आगे 'मीर' अब की कहिए गई वो तब की बात

Meer Taqi Meer

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बंद-ए-क़बा को ख़ूबाँ जिस वक़्त वा करेंगे ख़म्याज़ा-कश जो होंगे मिलने के क्या करेंगे रोना यही है मुझ को तेरी जफ़ा से हर-दम ये दिल-दिमाग़ दोनों कब तक वफ़ा करेंगे है दीन सर का देना गर्दन पे अपनी ख़ूबाँ जीते हैं तो तुम्हारा ये क़र्ज़ अदा करेंगे दरवेश हैं हम आख़िर दो-इक निगह की रुख़्सत गोशे में बैठे प्यारे तुम को दुआ करेंगे आख़िर तो रोज़े आए दो-चार रोज़ हम भी तरसा बचों में जा कर दारू पिया करेंगे कुछ तो कहेगा हम को ख़ामोश देख कर वो इस बात के लिए अब चुप ही रहा करेंगे आलम मिरे है तुझ पर आई अगर क़यामत तेरी गली के हर-सू महशर हुआ करेंगे दामान-ए-दश्त सूखा अब्रों की बे-तही से जंगल में रोने को अब हम भी चला करेंगे लाई तिरी गली तक आवारगी हमारी ज़िल्लत की अपनी अब हम इज़्ज़त किया करेंगे अहवाल-'मीर' क्यूँँकर आख़िर हो एक शब में इक उम्र हम ये क़िस्सा तुम से कहा करेंगे

Meer Taqi Meer

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शिकवा करूँँ मैं कब तक उस अपने मेहरबाँ का अल-क़िस्सा रफ़्ता रफ़्ता दुश्मन हुआ है जाँ का गिर्ये पे रंग आया क़ैद-ए-क़फ़स से शायद ख़ूँ हो गया जिगर में अब दाग़ गुल्सिताँ का ले झाड़ू टोकरा ही आता है सुब्ह होते जारूब-कश मगर है ख़ुर्शीद उस के हाँ का दी आग रंग-ए-गुल ने वाँ ऐ सबा चमन को याँ हम जले क़फ़स में सुन हाल आशियाँ का हर सुब्ह मेरे सर पर इक हादिसा नया है पैवंद हो ज़मीं का शेवा इस आसमाँ का इन सैद-अफ़गनों का क्या हो शिकार कोई होता नहीं है आख़िर काम उन के इम्तिहाँ का तब तो मुझे किया था तीरों से सैद अपना अब करते हैं निशाना हर मेरे उस्तुख़्वाँ का फ़ितराक जिस का अक्सर लोहू में तर रहे है वो क़स्द कब करे है इस सैद-ए-नातवाँ का कम-फ़ुर्सती जहाँ के मज में' की कुछ न पूछो अहवाल क्या कहूँ मैं इस मजलिस-ए-रवाँ का सज्दा करें हैं सुन कर औबाश सारे उस को सय्यद पिसर वो प्यारा हैगा इमाम बाँका ना-हक़ शनासी है ये ज़ाहिद न कर बराबर ताअ'त से सौ बरस की सज्दा उस आस्ताँ का हैं दश्त अब ये जीते बस्ते थे शहर सारे वीरान-ए-कुहन है मामूरा इस जहाँ का जिस दिन कि उस के मुँह से बुर्क़ा उठेगा सुनियो उस रोज़ से जहाँ में ख़ुर्शीद फिर न झाँका ना-हक़ ये ज़ुल्म करना इंसाफ़ कह पियारे है कौन सी जगह का किस शहर का कहाँ का सौदाई हो तो रक्खे बाज़ार-ए-इश्क़ में पा सर मुफ़्त बेचते हैं ये कुछ चलन है वाँ का सौ गाली एक चश्मक इतना सुलूक तो है औबाश ख़ाना जंग उस ख़ुश-चश्म बद-ज़बाँ का या रोए या रुलाया अपनी तो यूँँ ही गुज़री क्या ज़िक्र हम-सफ़ीराँ यारान-ए-शादमाँ का क़ैद-ए-क़फ़स में हैं तो ख़िदमत है नालगी की गुलशन में थे तो हम को मंसब था रौज़ा-ख़्वाँ का पूछो तो 'मीर' से क्या कोई नज़र पड़ा है चेहरा उतर रहा है कुछ आज उस जवाँ का

Meer Taqi Meer

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