ghazalKuch Alfaaz

अकेला ही चला था मैं अकेले ही सफ़र में हूँ मगर मैं कार - आमद हूँ दुआ में हूँ असर में हूँ ख़ता हो कोई मुझ सेे और लोगों को मिले मौक़ा' संभल कर पैर रखता हूँ ज़माने की नज़र में हूँ ज़हर के हूबहू बातें निकलने का यही कारन ज़हर ही मुझ में है या तो रगो - पै मैं ज़हर में हूँ तू आली है तू ने ही रंक को राजा बनाया है ख़ुदा तू मेरी सुन ले मैं हमेशा से सिफ़र में हूँ कभी सोंचो कि मैं हर बात पर हर बार क्यूँँ राजी मेरी उल्फ़त तुझे खोने से डरता हूँ तो डर में हूँ जो अच्छे दिल के हैं यारों वही गुमनाम रहते हैं मैं झूठा हूँ फ़रेबी हूँ मगर जानाँ ख़बर में हूँ मेरा तो ख़ूब मन करता कि उस के घर को जाऊँ मैं मगर वो ये नहीं कहता चले आओ मैं घर में हूँ

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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गरजती है बरसती है मनाती है वही लड़की परीशाँ जब भी होता हूँ हँसाती है वही लड़की शिकायत करती है वो भी मगर अंदाज़ ऐसा है लिपटती है गले कस के लगाती है वही लड़की जहाँ में जितनी ख़ूबी हैं मुझे सब उस में दिखती हैं न कोई और मुझ को सिर्फ़ भाती है वही लड़की वो कितनी ख़ूब-सूरत है मैं सब को अब बताऊँगा हुआ है ये मेरे सपनों में आती है वही लड़की हँसी में जब भी कहता हूँ मैं तुम को भूल जाऊँगा रो-रोकर यार तब ग़ुस्सा दिखाती है वही लड़की न जाने क्या क्या कहती है मेरे बीमार होने पर मुझे सच में बहुत बातें सुनाती है वही लड़की

Prashant Sitapuri

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मैं बुरा हूँ और हूँ मजबूऱ आदत के लिए दूर रहिए आप भी अपनी शराफत के लिए है अगर मुझ सेे गिला तो आज़मा के देख ले तू कहे तो जान हाज़िर है मुहब्बत के लिए तेरे आगे ख़ूब-सूरत चाँद भी फीका पड़े और क्या तारीफ़ तेरी यार सूरत के लिए आदतों से यार गर तासीर मिलती है यहाँ ख़ुद को भी बर्बाद कर लूँ मैं भी आदत के लिए मर के ही तो आदमी बनता बड़ा है आज , सो हम भी देखो मर रहे हैं थोड़ी इज़्ज़त के लिए बे-वफ़ा हैं, आप फिर भी दिल लगाया आपसे मिल रही है इस लिए भी दाद हिम्मत के लिए घर में कुछ भी बोल कर चल जाएगा तो काम पर भीड़ में क्या बोलना है सीख गैरत के लिए ये शिकायत मुझ को है क्यूँँ दोहरापन है यहाँ इस जहाँ में क़ायदे क्यूँँ सिर्फ़ औरत के लिए

Prashant Sitapuri

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