ghazalKuch Alfaaz

गरजती है बरसती है मनाती है वही लड़की परीशाँ जब भी होता हूँ हँसाती है वही लड़की शिकायत करती है वो भी मगर अंदाज़ ऐसा है लिपटती है गले कस के लगाती है वही लड़की जहाँ में जितनी ख़ूबी हैं मुझे सब उस में दिखती हैं न कोई और मुझ को सिर्फ़ भाती है वही लड़की वो कितनी ख़ूब-सूरत है मैं सब को अब बताऊँगा हुआ है ये मेरे सपनों में आती है वही लड़की हँसी में जब भी कहता हूँ मैं तुम को भूल जाऊँगा रो-रोकर यार तब ग़ुस्सा दिखाती है वही लड़की न जाने क्या क्या कहती है मेरे बीमार होने पर मुझे सच में बहुत बातें सुनाती है वही लड़की

Related Ghazal

बची है रौशनी जो भी चराग़ों से निकल जाए जो मेरे दिल से निकला है दु'आओं से निकल जाए हम ऐसे लोग जो दुश्मन के रोने पर ठहर जाएँ वो ऐसा शख़्स जो अपनों की लाशों से निकल जाए पढ़ाने का अगर मतलब है हाथों से निकल जाना ख़ुदाया फिर मिरी बेटी भी हाथों से निकल जाए वही इक शख़्स था मेरा यहाँ पर जी लगाने को उसी को चाहते थे सब कि गाँव से निकल जाए इधर तो छू रही है जिस्म मेरा ठंडे हाथों से उधर वो चाहती है रात बातों से निकल जाए नुमाइश बाप की दौलत की कर के सोचता था मैं कि शायद इम्तिहान-ए-इश्क़ पैसों से निकल जाए

Kushal Dauneria

25 likes

नहीं आता किसी पर दिल हमारा वही कश्ती वही साहिल हमारा तेरे दर पर करेंगे नौकरी हम तेरी गलियाँ हैं मुस्तक़बिल हमारा कभी मिलता था कोई होटलों में कभी भरता था कोई बिल हमारा

Tehzeeb Hafi

83 likes

वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का ढूँढ़ता था जो इक नई दुनिया लौट के अपने घर गया कब का वो जो लाया था हम को दरिया तक पार अकेले उतर गया कब का उस का जो हाल है वही जाने अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा अब कहाँ है बिखर गया कब का

Javed Akhtar

62 likes

ज़िंदगी इक फ़िल्म है मिलना बिछड़ना सीन हैं आँख के आँसू तिरे किरदार की तौहीन हैं एक ही मौसम वही मंज़र खटकने लगता है सच ये है हम आदतन बदलाव के शौक़ीन हैं नींद में पलकों से मेरी रंग छलके रात भर आँख में हैं तितलियाँ तो ख़्वाब भी रंगीन हैं राह तकती रात का ये रंग है तेरे बिना चाँद भी मायूस है तारे भी सब ग़मगीन हैं उँगलियों पे गिन मिरी तन्हाइयों के हम सफ़र इक उदासी जाम दूजा याद तेरी तीन हैं क़ाएदे से कब जिया है ज़िंदगी मैं ने तुझे मैं तिरा मुजरिम हूँ मेरे जुर्म तो संगीन हैं ख़ुशनुमा माहौल था कल तक थिरकते थे सभी आज आख़िर क्या हुआ है लोग क्यूँ ग़मगीन हैं

Sandeep Thakur

18 likes

मुझ में कितने राज़ हैं बतलाऊँ क्या बंद एक मुद्दत से हूँ खुल जाऊँ क्या आजिज़ी मिन्नत ख़ुशामद इल्तिजा और मैं क्या क्या करूँँ मर जाऊँ क्या तेरे जलसे में तेरा परचम लिए सैकड़ों लाशें भी हैं गिनवाऊँ क्या कल यहाँ मैं था जहाँ तुम आज हो मैं तुम्हारी ही तरह इतराऊँ क्या एक पत्थर है वो मेरी राह का गर न ठुकराऊँ तो ठोकर खाऊँ क्या फिर जगाया तू ने सोए शे'र को फिर वही लहजा दराज़ी आऊँ क्या

Rahat Indori

56 likes

More from Prashant Sitapuri

अकेला ही चला था मैं अकेले ही सफ़र में हूँ मगर मैं कार - आमद हूँ दुआ में हूँ असर में हूँ ख़ता हो कोई मुझ सेे और लोगों को मिले मौक़ा' संभल कर पैर रखता हूँ ज़माने की नज़र में हूँ ज़हर के हूबहू बातें निकलने का यही कारन ज़हर ही मुझ में है या तो रगो - पै मैं ज़हर में हूँ तू आली है तू ने ही रंक को राजा बनाया है ख़ुदा तू मेरी सुन ले मैं हमेशा से सिफ़र में हूँ कभी सोंचो कि मैं हर बात पर हर बार क्यूँँ राजी मेरी उल्फ़त तुझे खोने से डरता हूँ तो डर में हूँ जो अच्छे दिल के हैं यारों वही गुमनाम रहते हैं मैं झूठा हूँ फ़रेबी हूँ मगर जानाँ ख़बर में हूँ मेरा तो ख़ूब मन करता कि उस के घर को जाऊँ मैं मगर वो ये नहीं कहता चले आओ मैं घर में हूँ

Prashant Sitapuri

3 likes

मैं बुरा हूँ और हूँ मजबूऱ आदत के लिए दूर रहिए आप भी अपनी शराफत के लिए है अगर मुझ सेे गिला तो आज़मा के देख ले तू कहे तो जान हाज़िर है मुहब्बत के लिए तेरे आगे ख़ूब-सूरत चाँद भी फीका पड़े और क्या तारीफ़ तेरी यार सूरत के लिए आदतों से यार गर तासीर मिलती है यहाँ ख़ुद को भी बर्बाद कर लूँ मैं भी आदत के लिए मर के ही तो आदमी बनता बड़ा है आज , सो हम भी देखो मर रहे हैं थोड़ी इज़्ज़त के लिए बे-वफ़ा हैं, आप फिर भी दिल लगाया आपसे मिल रही है इस लिए भी दाद हिम्मत के लिए घर में कुछ भी बोल कर चल जाएगा तो काम पर भीड़ में क्या बोलना है सीख गैरत के लिए ये शिकायत मुझ को है क्यूँँ दोहरापन है यहाँ इस जहाँ में क़ायदे क्यूँँ सिर्फ़ औरत के लिए

Prashant Sitapuri

13 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Prashant Sitapuri.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Prashant Sitapuri's ghazal.