गरजती है बरसती है मनाती है वही लड़की परीशाँ जब भी होता हूँ हँसाती है वही लड़की शिकायत करती है वो भी मगर अंदाज़ ऐसा है लिपटती है गले कस के लगाती है वही लड़की जहाँ में जितनी ख़ूबी हैं मुझे सब उस में दिखती हैं न कोई और मुझ को सिर्फ़ भाती है वही लड़की वो कितनी ख़ूब-सूरत है मैं सब को अब बताऊँगा हुआ है ये मेरे सपनों में आती है वही लड़की हँसी में जब भी कहता हूँ मैं तुम को भूल जाऊँगा रो-रोकर यार तब ग़ुस्सा दिखाती है वही लड़की न जाने क्या क्या कहती है मेरे बीमार होने पर मुझे सच में बहुत बातें सुनाती है वही लड़की
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बची है रौशनी जो भी चराग़ों से निकल जाए जो मेरे दिल से निकला है दु'आओं से निकल जाए हम ऐसे लोग जो दुश्मन के रोने पर ठहर जाएँ वो ऐसा शख़्स जो अपनों की लाशों से निकल जाए पढ़ाने का अगर मतलब है हाथों से निकल जाना ख़ुदाया फिर मिरी बेटी भी हाथों से निकल जाए वही इक शख़्स था मेरा यहाँ पर जी लगाने को उसी को चाहते थे सब कि गाँव से निकल जाए इधर तो छू रही है जिस्म मेरा ठंडे हाथों से उधर वो चाहती है रात बातों से निकल जाए नुमाइश बाप की दौलत की कर के सोचता था मैं कि शायद इम्तिहान-ए-इश्क़ पैसों से निकल जाए
Kushal Dauneria
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नहीं आता किसी पर दिल हमारा वही कश्ती वही साहिल हमारा तेरे दर पर करेंगे नौकरी हम तेरी गलियाँ हैं मुस्तक़बिल हमारा कभी मिलता था कोई होटलों में कभी भरता था कोई बिल हमारा
Tehzeeb Hafi
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वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का ढूँढ़ता था जो इक नई दुनिया लौट के अपने घर गया कब का वो जो लाया था हम को दरिया तक पार अकेले उतर गया कब का उस का जो हाल है वही जाने अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा अब कहाँ है बिखर गया कब का
Javed Akhtar
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ज़िंदगी इक फ़िल्म है मिलना बिछड़ना सीन हैं आँख के आँसू तिरे किरदार की तौहीन हैं एक ही मौसम वही मंज़र खटकने लगता है सच ये है हम आदतन बदलाव के शौक़ीन हैं नींद में पलकों से मेरी रंग छलके रात भर आँख में हैं तितलियाँ तो ख़्वाब भी रंगीन हैं राह तकती रात का ये रंग है तेरे बिना चाँद भी मायूस है तारे भी सब ग़मगीन हैं उँगलियों पे गिन मिरी तन्हाइयों के हम सफ़र इक उदासी जाम दूजा याद तेरी तीन हैं क़ाएदे से कब जिया है ज़िंदगी मैं ने तुझे मैं तिरा मुजरिम हूँ मेरे जुर्म तो संगीन हैं ख़ुशनुमा माहौल था कल तक थिरकते थे सभी आज आख़िर क्या हुआ है लोग क्यूँ ग़मगीन हैं
Sandeep Thakur
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मुझ में कितने राज़ हैं बतलाऊँ क्या बंद एक मुद्दत से हूँ खुल जाऊँ क्या आजिज़ी मिन्नत ख़ुशामद इल्तिजा और मैं क्या क्या करूँँ मर जाऊँ क्या तेरे जलसे में तेरा परचम लिए सैकड़ों लाशें भी हैं गिनवाऊँ क्या कल यहाँ मैं था जहाँ तुम आज हो मैं तुम्हारी ही तरह इतराऊँ क्या एक पत्थर है वो मेरी राह का गर न ठुकराऊँ तो ठोकर खाऊँ क्या फिर जगाया तू ने सोए शे'र को फिर वही लहजा दराज़ी आऊँ क्या
Rahat Indori
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अकेला ही चला था मैं अकेले ही सफ़र में हूँ मगर मैं कार - आमद हूँ दुआ में हूँ असर में हूँ ख़ता हो कोई मुझ सेे और लोगों को मिले मौक़ा' संभल कर पैर रखता हूँ ज़माने की नज़र में हूँ ज़हर के हूबहू बातें निकलने का यही कारन ज़हर ही मुझ में है या तो रगो - पै मैं ज़हर में हूँ तू आली है तू ने ही रंक को राजा बनाया है ख़ुदा तू मेरी सुन ले मैं हमेशा से सिफ़र में हूँ कभी सोंचो कि मैं हर बात पर हर बार क्यूँँ राजी मेरी उल्फ़त तुझे खोने से डरता हूँ तो डर में हूँ जो अच्छे दिल के हैं यारों वही गुमनाम रहते हैं मैं झूठा हूँ फ़रेबी हूँ मगर जानाँ ख़बर में हूँ मेरा तो ख़ूब मन करता कि उस के घर को जाऊँ मैं मगर वो ये नहीं कहता चले आओ मैं घर में हूँ
Prashant Sitapuri
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मैं बुरा हूँ और हूँ मजबूऱ आदत के लिए दूर रहिए आप भी अपनी शराफत के लिए है अगर मुझ सेे गिला तो आज़मा के देख ले तू कहे तो जान हाज़िर है मुहब्बत के लिए तेरे आगे ख़ूब-सूरत चाँद भी फीका पड़े और क्या तारीफ़ तेरी यार सूरत के लिए आदतों से यार गर तासीर मिलती है यहाँ ख़ुद को भी बर्बाद कर लूँ मैं भी आदत के लिए मर के ही तो आदमी बनता बड़ा है आज , सो हम भी देखो मर रहे हैं थोड़ी इज़्ज़त के लिए बे-वफ़ा हैं, आप फिर भी दिल लगाया आपसे मिल रही है इस लिए भी दाद हिम्मत के लिए घर में कुछ भी बोल कर चल जाएगा तो काम पर भीड़ में क्या बोलना है सीख गैरत के लिए ये शिकायत मुझ को है क्यूँँ दोहरापन है यहाँ इस जहाँ में क़ायदे क्यूँँ सिर्फ़ औरत के लिए
Prashant Sitapuri
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