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az-mehr ta-ba-zarra dil-o-dil hai aaina tuuti ko shash-jihat se muqabil hai aaina hairat hujum-e-lazzat-e-ghhaltani-e-tapish simab-e-balish o kamar-e-dil hai aaina ghhaflat ba-bal-e-jauhar-e-shamshir par-fishan yaan pusht-e-chashm-e-shokhi-e-qatil hai aaina hairat-nigah-e-barq-e-tamasha bahar-e-shokh dar-parda-e-hava par-e-bismil hai aaina yaan rah gae hain nakhun-e-tadbir tuut kar jauhar-tilism-e-uqda-e-mushkil hai aaina ham-zanu-e-taammul o ham-jalva-gah-e-gul aina-band khalvat-o-mahfil hai aaina dil kar-gah-e-fikr o 'asad' be-nava-e-dil yaan sang-e-astana-e-'bedil' hai aaina az-mehr ta-ba-zarra dil-o-dil hai aaina tuti ko shash-jihat se muqabil hai aaina hairat hujum-e-lazzat-e-ghaltani-e-tapish simab-e-baalish o kamar-e-dil hai aaina ghaflat ba-baal-e-jauhar-e-shamshir par-fishan yan pusht-e-chashm-e-shokhi-e-qatil hai aaina hairat-nigah-e-barq-e-tamasha bahaar-e-shokh dar-parda-e-hawa par-e-bismil hai aaina yan rah gae hain nakhun-e-tadbir tut kar jauhar-tilism-e-uqda-e-mushkil hai aaina ham-zanu-e-tammul o ham-jalwa-gah-e-gul aaina-band khalwat-o-mahfil hai aaina dil kar-gah-e-fikr o 'asad' be-nawa-e-dil yan sang-e-astana-e-'bedil' hai aaina

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की इतराए क्यूँँ न ख़ाक सर-ए-रहगुज़ार की जब उस के देखने के लिए आएँ बादशाह लोगों में क्यूँँ नुमूद न हो लाला-ज़ार की भूके नहीं हैं सैर-ए-गुलिस्ताँ के हम वले क्यूँँकर न खाइए कि हवा है बहार की

Mirza Ghalib

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रफ़्तार-ए-उम्र क़त-ए-रह-ए-इज़्तिराब है इस साल के हिसाब को बर्क़ आफ़्ताब है मीना-ए-मय है सर्व नशात-ए-बहार से बाल-ए-तदर्रव जल्वा-ए-मौज-ए-शराब है ज़ख़्मी हुआ है पाश्ना पा-ए-सबात का ने भागने की गूँ न इक़ामत की ताब है जादाद-ए-बादा-नोशी-ए-रिन्दाँ है शश-जिहत ग़ाफ़िल गुमाँ करे है कि गेती ख़राब है नज़्ज़ारा क्या हरीफ़ हो उस बर्क़-ए-हुस्न का जोश-ए-बहार जल्वे को जिस के नक़ाब है मैं ना-मुराद दिल की तसल्ली को क्या करूँँ माना कि तेरे रुख़ से निगह कामयाब है गुज़रा 'असद' मसर्रत-ए-पैग़ाम-ए-यार से क़ासिद पे मुझ को रश्क-ए-सवाल-ओ-जवाब है ज़ाहिर है तर्ज़-ए-क़ैद से सय्याद की ग़रज़ जो दाना दाम में है सो अश्क-ए-कबाब है बे-चश्म-ए-दिल न कर हवस-ए-सैर-ए-लाला-ज़ार या'नी ये हर वरक़ वरक़-ए-इंतिख़ाब है

Mirza Ghalib

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दिल लगा कर लग गया उन को भी तन्हा बैठना बारे अपनी बेकसी की हम ने पाई दाद याँ हैं ज़वाल-आमादा अज्ज़ा आफ़रीनश के तमाम महर-ए-गर्दूं है चराग़-ए-रहगुज़ार-ए-बाद याँ है तरह्हुम-आफ़रीं आराइश-ए-बे-दाद याँ अश्क-ए-चश्म-ए-दाम है हर दाना-ए-सय्याद याँ है गुदाज़-ए-मोम अंदाज़-ए-चकीदन-हा-ए-ख़ूँ नीश-ए-ज़ंबूर-ए-असल है नश्तर-ए-फ़स्साद याँ ना-गवारा है हमें एहसान-ए-साहब-दाैलताँ है ज़र-ए-गुल भी नज़र में जौहर-ए-फ़ौलाद याँ जुम्बिश-ए-दिल से हुए हैं उक़्दा-हा-ए-कार वा कम-तरीं मज़दूर-ए-संगीं-दस्त है फ़रहाद याँ क़तरा-हा-ए-ख़ून-ए-बिस्मिल ज़ेब-ए-दामाँ हैं 'असद' है तमाशा करदनी गुल-चीनी-ए-जल्लाद याँ

Mirza Ghalib

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हसद से दिल अगर अफ़्सुर्दा है गर्म-ए-तमाशा हो कि चश्म-ए-तंग शायद कसरत-ए-नज़्ज़ारा से वा हो ब-क़द्र-ए-हसरत-ए-दिल चाहिए ज़ौक़-ए-मआसी भी भरूँ यक-गोशा-ए-दामन गर आब-ए-हफ़्त-दरिया हो अगर वो सर्व-क़द गर्म-ए-ख़िराम-ए-नाज़ आ जावे कफ़-ए-हर-ख़ाक-ए-गुलशन शक्ल-ए-क़ुमरी नाला-फ़र्सा हो बहम बालीदन-ए-संग-ओ-गुल-ए-सहरा ये चाहे है कि तार-ए-जादा भी कोहसार को ज़ुन्नार-ए-मीना हो हरीफ़-ए-वहशत-ए-नाज़-ए-नसीम-ए-इश्क़ जब आऊँ कि मिस्ल-ए-ग़ुंचा साज़-ए-यक-गुलिस्ताँ दिल मुहय्या हो बजाए दाना ख़िर्मन यक-बयाबाँ बैज़ा-ए-कुमरी मिरा हासिल वो नुस्ख़ा है कि जिस से ख़ाक पैदा हो करे क्या साज़-ए-बीनिश वो शहीद-ए-दर्द-आगाही जिसे मू-ए-दिमाग़-ए-बे-ख़ुदी ख़्वाब-ए-ज़ुलेख़ा हो दिल-ए-जूँ-शम्अ' बहर-ए-दावत-ए-नज़्ज़ारा लायानी निगह लबरेज़-ए-अश्क ओ सीना मामूर-ए-तमन्ना हो न देखें रू-ए-यक-दिल सर्द ग़ैर-अज़ शम-ए-काफ़ूरी ख़ुदाया इस क़दर बज़्म-ए-'असद' गर्म-ए-तमाशा हो

Mirza Ghalib

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जुज़ क़ैस और कोई न आया ब-रू-ए-कार सहरा मगर ब-तंगी-ए-चश्म-ए-हसूद था आशुफ़्तगी ने नक़्श-ए-सुवैदा किया दुरुस्त ज़ाहिर हुआ कि दाग़ का सरमाया दूद था था ख़्वाब में ख़याल को तुझ से मुआ'मला जब आँख खुल गई न ज़ियाँ था न सूद था लेता हूँ मकतब-ए-ग़म-ए-दिल में सबक़ हनूज़ लेकिन यही कि रफ़्त गया और बूद था ढाँपा कफ़न ने दाग़-ए-उयूब-ए-बरहनगी मैं वर्ना हर लिबास में नंग-ए-वजूद था तेशे बग़ैर मर न सका कोहकन 'असद' सरगश्ता-ए-ख़ुमार-ए-रुसूम-ओ-क़ुयूद था आलम जहाँ ब-अर्ज़-ए-बिसात-ए-वजूद था जूँ सुब्ह चाक-ए-जेब मुझे तार-ओ-पूद था बाज़ी-ख़ुर-ए-फ़रेब है अहल-ए-नज़र का ज़ौक़ हंगामा गर्म-ए-हैरत-ए-बूद-ओ-नबूद था आलम तिलिस्म-ए-शहर-ए-ख़मोशी है सर-बसर या मैं ग़रीब-ए-किश्वर-ए-गुफ़्त-ओ-शुनूद था तंगी रफ़ीक़-ए-रह थी अदम या वजूद था मेरा सफ़र ब-ताला-ए-चश्म-ए-हसूद था तू यक-जहाँ क़माश-ए-हवस जम्अ'' कर कि मैं हैरत-मता-ए-आलम-ए-नुक़्सान-ओ-सूद था गर्दिश-मुहीत-ए-ज़ुल्म रहा जिस क़दर फ़लक मैं पाएमाल-ए-ग़म्ज़ा-ए-चश्म-ए-कबूद था पूछा था गरचे यार ने अहवाल-ए-दिल मगर किस को दिमाग़-ए-मिन्नत-ए-गुफ़्त-ओ-शुनूद था ख़ुर शबनम-आश्ना न हुआ वर्ना मैं 'असद' सर-ता-क़दम गुज़ारिश-ए-ज़ौक़-ए-सुजूद था

Mirza Ghalib

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