ghazalKuch Alfaaz

बे-कैफ़ दिल है और जिए जा रहा हूँ मैं ख़ाली है शीशा और पिए जा रहा हूँ मैं पैहम जो आह आह किए जा रहा हूँ मैं दौलत है ग़म ज़कात दिए जा रहा हूँ मैं मजबूरी-ए-कमाल-ए-मोहब्बत तो देखना जीना नहीं क़ुबूल जिए जा रहा हूँ मैं वो दिल कहाँ है अब कि जिसे प्यार कीजिए मजबूरियाँ हैं साथ दिए जा रहा हूँ मैं रुख़्सत हुई शबाब के हमराह ज़िंदगी कहने की बात है कि जिए जा रहा हूँ मैं पहले शराब ज़ीस्त थी अब ज़ीस्त है शराब कोई पिला रहा है पिए जा रहा हूँ मैं

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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इश्क़ को बे-नक़ाब होना था आप अपना जवाब होना था मस्त-ए-जाम-ए-शराब होना था बे-ख़ुद-ए-इज़्तिराब होना था तेरी आँखों का कुछ क़ुसूर नहीं हाँ मुझी को ख़राब होना था आओ मिल जाओ मुस्कुरा के गले हो चुका जो इताब होना था कूचा-ए-इश्क़ में निकल आया जिस को ख़ाना-ख़राब होना था मस्त-ए-जाम-ए-शराब ख़ाक होते ग़र्क़-ए-जाम-ए-शराब होना था दिल कि जिस पर हैं नक़्श-ए-रंगा-रंग उस को सादा किताब होना था हम ने नाकामियों को ढूँड लिया आख़िरश कामयाब होना था हाए वो लम्हा-ए-सुकूँ कि जिसे महशर-ए-इज़्तिराब होना था निगह-ए-यार ख़ुद तड़प उठती शर्त-ए-अव्वल ख़राब होना था क्यूँँ न होता सितम भी बे-पायाँ करम-ए-बे-हिसाब होना था क्यूँँ नज़र हैरतों में डूब गई मौज-ए-सद-इज़्तिराब होना था हो चुका रोज़-ए-अव्वलीं ही 'जिगर' जिस को जितना ख़राब होना था

Jigar Moradabadi

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किया तअज्जुब कि मिरी रूह-ए-रवाँ तक पहुँचे पहले कोई मिरे नग़्मों की ज़बाँ तक पहुँचे जब हर इक शोरिश-ए-ग़म ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ तक पहुँचे फिर ख़ुदा जाने ये हंगामा कहाँ तक पहुँचे आँख तक दिल से न आए न ज़बाँ तक पहुँचे बात जिस की है उसी आफ़त-ए-जाँ तक पहुँचे तू जहाँ पर था बहुत पहले वहीं आज भी है देख रिंदान-ए-ख़ुश-अन्फ़ास कहाँ तक पहुँचे जो ज़माने को बुरा कहते हैं ख़ुद हैं वो बुरे काश ये बात तिरे गोश-ए-गिराँ तक पहुँचे बढ़ के रिंदों ने क़दम हज़रत-ए-वाइज़ के लिए गिरते पड़ते जो दर-ए-पीर-ए-मुग़ाँ तक पहुँचे तू मिरे हाल-ए-परेशाँ पे बहुत तंज़ न कर अपने गेसू भी ज़रा देख कहाँ तक पहुँचे उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे इश्क़ की चोट दिखाने में कहीं आती है कुछ इशारे थे कि जो लफ़्ज़-ओ-बयाँ तक पहुँचे जल्वे बेताब थे जो पर्दा-ए-फ़ितरत में 'जिगर' ख़ुद तड़प कर मिरी चश्म-ए-निगराँ तक पहुँचे

Jigar Moradabadi

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अगर न ज़ोहरा-जबीनों के दरमियाँ गुज़रे तो फिर ये कैसे कटे ज़िंदगी कहाँ गुज़रे जो तेरे आरिज़ ओ गेसू के दरमियाँ गुज़रे कभी कभी वही लम्हे बला-ए-जाँ गुज़रे मुझे ये वहम रहा मुद्दतों कि जुरअत-ए-शौक़ कहीं न ख़ातिर-ए-मासूम पर गिराँ गुज़रे हर इक मक़ाम-ए-मोहब्बत बहुत ही दिलकश था मगर हम अहल-ए-मोहब्बत कशाँ कशाँ गुज़रे जुनूँ के सख़्त मराहिल भी तेरी याद के साथ हसीं हसीं नज़र आए जवाँ जवाँ गुज़रे मिरी नज़र से तिरी जुस्तुजू के सदक़े में ये इक जहाँ ही नहीं सैंकड़ों जहाँ गुज़रे हुजूम-ए-जल्वा में परवाज़-ए-शौक़ क्या कहना कि जैसे रूह सितारों के दरमियाँ गुज़रे ख़ता मुआ'फ़ ज़माने से बद-गुमाँ हो कर तिरी वफ़ा पे भी क्या क्या हमें गुमाँ गुज़रे मुझे था शिकवा-ए-हिज्राँ कि ये हुआ महसूस मिरे क़रीब से हो कर वो ना-गहाँ गुज़रे रह-ए-वफ़ा में इक ऐसा मक़ाम भी आया कि हम ख़ुद अपनी तरफ़ से भी बद-गुमाँ गुज़रे ख़ुलूस जिस में हो शामिल वो दौर-ए-इश्क़-ओ-हवस न राएगाँ कभी गुज़रा न राएगाँ गुज़रे उसी को कहते हैं जन्नत उसी को दोज़ख़ भी वो ज़िंदगी जो हसीनों के दरमियाँ गुज़रे बहुत हसीन मनाज़िर भी हुस्न-ए-फ़ितरत के न जाने आज तबीअत पे क्यूँँ गिराँ गुज़रे वो जिन के साए से भी बिजलियाँ लरज़ती थीं मिरी नज़र से कुछ ऐसे भी आशियाँ गुज़रे मिरा तो फ़र्ज़ चमन-बंदी-ए-जहाँ है फ़क़त मिरी बला से बहार आए या ख़िज़ाँ गुज़रे कहाँ का हुस्न कि ख़ुद इश्क़ को ख़बर न हुई रह-ए-तलब में कुछ ऐसे भी इम्तिहाँ गुज़रे भरी बहार में ताराजी-ए-चमन मत पूछ ख़ुदा करे न फिर आँखों से वो समाँ गुज़रे कोई न देख सका जिन को वो दिलों के सिवा मुआमलात कुछ ऐसे भी दरमियाँ गुज़रे कभी कभी तो इसी एक मुश्त-ए-ख़ाक के गिर्द तवाफ़ करते हुए हफ़्त आसमाँ गुज़रे बहुत हसीन सही सोहबतें गुलों की मगर वो ज़िंदगी है जो काँटों के दरमियाँ गुज़रे अभी से तुझ को बहुत नागवार हैं हमदम वो हादसात जो अब तक रवाँ-दवाँ गुज़रे जिन्हें कि दीदा-ए-शाइर ही देख सकता है वो इंक़िलाब तिरे सामने कहाँ गुज़रे बहुत अज़ीज़ है मुझ को उन्हें क्या याद 'जिगर' वो हादसात-ए-मोहब्बत जो ना-गहाँ गुज़रे

Jigar Moradabadi

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वो जो रूठें यूँँ मनाना चाहिए ज़िंदगी से रूठ जाना चाहिए हिम्मत-ए-क़ातिल बढ़ाना चाहिए ज़ेर-ए-ख़ंजर मुस्कुराना चाहिए ज़िंदगी है नाम ज़ोहद ओ जंग का मौत क्या है भूल जाना चाहिए है इन्हीं धोकों से दिल की ज़िंदगी जो हसीं धोका हो खाना चाहिए लज़्ज़तें हैं दुश्मन-ए-औज-ए-कमाल कुल्फ़तों से जी लगाना चाहिए उन से मिलने को तो क्या कहिए 'जिगर' ख़ुद से मिलने को ज़माना चाहिए

Jigar Moradabadi

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सभी अंदाज़-ए-हुस्न प्यारे हैं हम मगर सादगी के मारे हैं उस की रातों का इंतिक़ाम न पूछ जिस ने हँस हँस के दिन गुज़ारे हैं ऐ सहारों की ज़िंदगी वालो कितने इंसान बे-सहारे हैं लाला-ओ-गुल से तुझ को क्या निस्बत ना-मुकम्मल से इस्तिआ'रे हैं हम तो अब डूब कर ही उभरेंगे वो रहें शाद जो किनारे हैं शब-ए-फ़ुर्क़त भी जगमगा उट्ठी अश्क-ए-ग़म हैं कि माह-पारे हैं आतिश-ए-इश्क़ वो जहन्नम है जिस में फ़िरदौस के नज़ारे हैं वो हमीं हैं कि जिन के हाथों ने गेसू-ए-ज़िंदगी सँवारे हैं हुस्न की बे-नियाज़ियों पे न जा बे-इशारे भी कुछ इशारे हैं

Jigar Moradabadi

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