bana gulab to kante chubha gaya ik shakhs hua charaghh to ghar hi jala gaya ik shakhs tamam rang mire aur saare khvab mire fasana the ki fasana bana gaya ik shakhs main kis hava men uduun kis faza men lahraun dukhon ke jaal har ik su bichha gaya ik shakhs palat sakun hi na aage hi badh sakun jis par mujhe ye kaun se raste laga gaya ik shakhs mohabbaten bhi ajab us ki nafraten bhi kamal miri hi tarah ka mujh men sama gaya ik shakhs mohabbaton ne kisi ki bhula rakha tha use mile vo zakhm ki phir yaad aa gaya ik shakhs khula ye raaz ki aina-khana hai duniya aur us men mujh ko tamasha bana gaya ik shakhs bana gulab to kante chubha gaya ek shakhs hua charagh to ghar hi jala gaya ek shakhs tamam rang mere aur sare khwab mere fasana the ki fasana bana gaya ek shakhs main kis hawa mein udun kis faza mein lahraun dukhon ke jal har ek su bichha gaya ek shakhs palat sakun hi na aage hi badh sakun jis par mujhe ye kaun se raste laga gaya ek shakhs mohabbaten bhi ajab us ki nafraten bhi kamal meri hi tarah ka mujh mein sama gaya ek shakhs mohabbaton ne kisi ki bhula rakha tha use mile wo zakhm ki phir yaad aa gaya ek shakhs khula ye raaz ki aaina-khana hai duniya aur us mein mujh ko tamasha bana gaya ek shakhs
Related Ghazal
सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
140 likes
हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए
Yasir Khan
92 likes
जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो
Tehzeeb Hafi
268 likes
तेरा चुप रहना मेरे ज़ेहन में क्या बैठ गया इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया यूँँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया इतना मीठा था वो ग़ुस्से भरा लहजा मत पूछ उस ने जिस को भी जाने का कहा, बैठ गया अपना लड़ना भी मोहब्बत है तुम्हें इल्म नहीं चीख़ती तुम रही और मेरा गला बैठ गया उस की मर्ज़ी वो जिसे पास बिठा ले अपने इस पे क्या लड़ना फुलाँ मेरी जगह बैठ गया बात दरियाओं की, सूरज की, न तेरी है यहाँ दो क़दम जो भी मेरे साथ चला बैठ गया बज़्म-ए-जानाँ में नशिस्तें नहीं होतीं मख़्सूस जो भी इक बार जहाँ बैठ गया बैठ गया
Tehzeeb Hafi
203 likes
ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
355 likes
More from Obaidullah Aleem
अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए मिले हैं यूँँ तो बहुत आओ अब मिलें यूँँ भी कि रूह गर्मी-ए-अनफ़ास से पिघल जाए मोहब्बतों में अजब है दिलों को धड़का सा कि जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाए ज़हे वो दिल जो तमन्ना-ए-ताज़ा-तर में रहे ख़ोशा वो उम्र जो ख़्वाबों ही में बहल जाए मैं वो चराग़ सर-ए-रहगुज़ार-ए-दुनिया हूँ जो अपनी ज़ात की तन्हाइयों में जल जाए हर एक लहजा यही आरज़ू यही हसरत जो आग दिल में है वो शे'र में भी ढल जाए
Obaidullah Aleem
1 likes
वो रात बे-पनाह थी और मैं ग़रीब था वो जिस ने ये चराग़ जलाया अजीब था वो रौशनी कि आँख उठाई नहीं गई कल मुझ से मेरा चाँद बहुत ही क़रीब था देखा मुझे तो तब्अ रवाँ हो गई मिरी वो मुस्कुरा दिया तो मैं शाइ'र अदीब था रखता न क्यूँँ मैं रूह ओ बदन उस के सामने वो यूँँ भी था तबीब वो यूँँ भी तबीब था हर सिलसिला था उस का ख़ुदा से मिला हुआ चुप हो कि लब-कुशा हो बला का ख़तीब था मौज-ए-नशात ओ सैल-ए-ग़म-ए-जाँ थे एक साथ गुलशन में नग़्मा-संज अजब अंदलीब था मैं भी रहा हूँ ख़ल्वत-ए-जानाँ में एक शाम ये ख़्वाब है या वाक़ई मैं ख़ुश-नसीब था हर्फ़-ए-दुआ ओ दस्त-ए-सख़ावत के बाब में ख़ुद मेरा तजरबा है वो बे-हद नजीब था देखा है उस को ख़ल्वत ओ जल्वत में बार-हा वो आदमी बहुत ही अजीब-ओ-ग़रीब था लिक्खो तमाम उम्र मगर फिर भी तुम 'अलीम' उस को दिखा न पाओ वो ऐसा हबीब था
Obaidullah Aleem
0 likes
कोई धुन हो मैं तिरे गीत ही गाए जाऊँ दर्द सीने में उठे शोर मचाए जाऊँ ख़्वाब बन कर तू बरसता रहे शबनम शबनम और बस मैं इसी मौसम में नहाए जाऊँ तेरे ही रंग उतरते चले जाएँ मुझ में ख़ुद को लिक्खूँ तिरी तस्वीर बनाए जाऊँ जिस को मिलना नहीं फिर उस से मोहब्बत कैसी सोचता जाऊँ मगर दिल में बसाए जाऊँ अब तू उस की हुई जिस पे मुझे प्यार आता है ज़िंदगी आ तुझे सीने से लगाए जाऊँ यही चेहरे मिरे होने की गवाही देंगे हर नए हर्फ़ में जाँ अपनी समाए जाऊँ जान तो चीज़ है क्या रिश्ता-ए-जाँ से आगे कोई आवाज़ दिए जाए मैं आए जाऊँ शायद इस राह पे कुछ और भी राही आएँ धूप में चलता रहूँ साए बिछाए जाऊँ अहल-ए-दिल होंगे तो समझेंगे सुख़न को मेरे बज़्म में आ ही गया हूँ तो सुनाए जाऊँ
Obaidullah Aleem
1 likes
शिकस्ता-हाल सा बे-आसरा सा लगता है ये शहर दिल से ज़ियादा दुखा सा लगता है हर इक के साथ कोई वाक़िआ' सा लगता है जिसे भी देखो वो खोया हुआ सा लगता है ज़मीन है सो वो अपनी गर्दिशों में कहीं जो चाँद है सो वो टूटा हुआ सा लगता है मेरे वतन पे उतरते हुए अँधेरों को जो तुम कहो मुझे क़हर-ए-ख़ुदा सा लगता है जो शाम आई तो फिर शाम का लगा दरबार जो दिन हुआ तो वो दिन कर्बला सा लगता है ये रात खा गई इक एक कर के सारे चराग़ जो रह गया है वो बुझता हुआ सा लगता है दुआ करो कि मैं उस के लिए दुआ हो जाऊँ वो एक शख़्स जो दिल को दुआ सा लगता है तो दिल में बुझने सी लगती है काएनात तमाम कभी कभी जो मुझे तू बुझा सा लगता है जो आ रही है सदा ग़ौर से सुनो उस को कि इस सदा में ख़ुदा बोलता सा लगता है अभी ख़रीद लें दुनिया कहाँ की महँगी है मगर ज़मीर का सौदा बुरा सा लगता है ये मौत है या कोई आख़िरी विसाल के बा'द अजब सुकून में सोया हुआ सा लगता है हवा-ए-रंग-ए-दो-आलम में जागती हुई लय 'अलीम' ही कहीं नग़्मा-सरा सा लगता है
Obaidullah Aleem
0 likes
पा-ब-ज़ंजीर सही ज़मज़मा-ख़्वाँ हैं हम लोग महफ़िल-ए-वक़्त तिरी रूह-ए-रवाँ हैं हम लोग दोश पर बार-ए-शब-ए-ग़म लिए गुल की मानिंद कौन समझे कि मोहब्बत की ज़बाँ हैं हम लोग ख़ूब पाया है सिला तेरी परस्तारी का देख ऐ सुब्ह-ए-तरब आज कहाँ हैं हम लोग इक मता-ए-दिल-ओ-जाँ पास थी सो हार चुके हाए ये वक़्त कि अब ख़ुद पे गराँ हैं हम लोग निकहत-ए-गुल की तरह नाज़ से चलने वालो हम भी कहते थे कि आसूदा-ए-जाँ हैं हम लोग कोई बतलाए कि कैसे ये ख़बर आम करें ढूँडती है जिसे दुनिया वो निशाँ हैं हम लोग क़िस्मत-ए-शब-ज़दगाँ जाग ही जाएगी 'अलीम' जरस-ए-क़ाफ़िला-ए-ख़ुश-ख़बराँ हैं हम लोग
Obaidullah Aleem
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Obaidullah Aleem.
Similar Moods
More moods that pair well with Obaidullah Aleem's ghazal.







