ghazalKuch Alfaaz

बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँँ नहीं जाता जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँँ नहीं जाता सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँँ नहीं जाता वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँँ नहीं जाता मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यूँँ नहीं जाता वो ख़्वाब जो बरसों से न चेहरा न बदन है वो ख़्वाब हवाओं में बिखर क्यूँँ नहीं जाता

Nida Fazli5 Likes

Related Ghazal

तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं

Dagh Dehlvi

84 likes

ग़ज़ल तो सब को मीठी लग रही थी मगर नातिक को मिर्ची लग रही थी तुम्हारे लब नहीं चू में थे जब तक मुझे हर चीज़ कड़वी लग रही थी मैं जिस दिन छोड़ने वाला था उस को वो उस दिन सब सेे प्यारी लग रही थी

Zubair Ali Tabish

80 likes

ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

292 likes

बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

196 likes

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

130 likes

More from Nida Fazli

दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही दोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही चंद लम्हों को ही बनती हैं मुसव्विर आँखें ज़िंदगी रोज़ तो तस्वीर बनाने से रही इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी रात जंगल में कोई शम्अ' जलाने से रही फ़ासला चाँद बना देता है हर पत्थर को दूर की रौशनी नज़दीक तो आने से रही शहर में सब को कहाँ मिलती है रोने की जगह अपनी इज़्ज़त भी यहाँ हँसने हँसाने से रही

Nida Fazli

0 likes

हर इक रस्ता अँधेरों में घिरा है मोहब्बत इक ज़रूरी हादिसा है गरजती आँधियाँ ज़ाएअ'' हुई हैं ज़मीं पे टूट के आँसू गिरा है निकल आए किधर मंज़िल की धुन में यहाँ तो रास्ता ही रास्ता है दुआ के हाथ पत्थर हो गए हैं ख़ुदा हर ज़ेहन में टूटा पड़ा है तुम्हारा तजरबा शायद अलग हो मुझे तो इल्म ने भटका दिया है

Nida Fazli

2 likes

दुख में नीर बहा देते थे सुख में हँसने लगते थे सीधे-सादे लोग थे लेकिन कितने अच्छे लगते थे नफ़रत चढ़ती आँधी जैसी प्यार उबलते चश्मों सा बैरी हूँ या संगी साथी सारे अपने लगते थे बहते पानी दुख-सुख बाँटें पेड़ बड़े बूढ़ों जैसे बच्चों की आहट सुनते ही खेत लहकने लगते थे नदिया पर्बत चाँद निगाहें माला एक कई दाने छोटे छोटे से आँगन भी कोसों फैले लगते थे

Nida Fazli

2 likes

कुछ दिनों तो शहर सारा अजनबी सा हो गया फिर हुआ यूँँ वो किसी की मैं किसी का हो गया इश्क़ कर के देखिए अपना तो ये है तजरबा घर मोहल्ला शहर सब पहले से अच्छा हो गया क़ब्र में हक़-गोई बाहर मंक़बत क़व्वालियाँ आदमी का आदमी होना तमाशा हो गया वो ही मूरत वो ही सूरत वो ही क़ुदरत की तरह उस को जिस ने जैसा सोचा वो भी वैसा हो गया

Nida Fazli

3 likes

गरज-बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला चिड़ियों को दाने बच्चों को गुड़-धानी दे मौला दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला फिर रौशन कर ज़हर का प्याला चमका नई सलीबें झूटों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला फिर मूरत से बाहर आ कर चारों ओर बिखर जा फिर मंदिर को कोई 'मीरा' दीवानी दे मौला तेरे होते कोई किस की जान का दुश्मन क्यूँँ हो जीने वालों को मरने की आसानी दे मौला

Nida Fazli

1 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Nida Fazli.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Nida Fazli's ghazal.